तिलिस्म का दरकता दायरा: साख के संकट से दो-चार होती सत्ता और भारतीय लोकतंत्र का नया मोड़
नई दिल्ली: किसी भी राजनीतिक सत्ता के पतन का इतिहास यह बताता है कि उसका अंत कभी भी अचानक नहीं होता। वह पहले भीतर से खोखली होती है, फिर उसकी साख के किले पर दरारें पड़ती हैं, और अंततः वह उस जन-आक्रोश के सामने घुटने टेकने पर विवश हो जाती है जिसे वह अपनी प्रशासनिक मशीनरी के बल पर कुचलने का भ्रम पाले रहती है। बारह वर्षों तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता का सबसे बड़ा संबल एक ऐसी अजेय छवि का निर्माण था, जिसके तहत यह संदेश दिया जाता था कि यह सरकार कभी झुकती नहीं, आलोचनाओं के आगे विचलित नहीं होती और किसी भी मंत्री या संवैधानिक पदाधिकारी की कुर्सी विपक्ष के दबाव या सड़क के शोर से नहीं हिल सकती। नोटबंदी से लेकर किसान आंदोलन और 2024 के बहुचर्चित NEET पेपर लीक तक, शासन का यही संदेश रहा कि निर्णय दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तय होते हैं, जन-आंदोलनों की भट्ठी में नहीं।
किंतु, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य उस कथित ‘तिलिस्म’ के टूटने और एक नए, तीखे संक्रमण काल की गवाही दे रहा है। जुलाई में पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से हटना पड़ा, और अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय के कठघरे में आ खड़ी हुई है। चुनाव आयोग के भीतर से उठी असहमति की आवाजें, आयुक्तों के लिखित आपत्तियों के दस्तावेज और विपक्ष के प्रमुख नेताओं का चुनाव आयोग के द्वार तक पहुंचकर हिरासत में लिया जाना—ये सब इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि सत्ता के अहंकार और अजेय होने के मिथक का आवरण अब तेजी से उतर रहा है। जब किसी हुकूमत के सामने संकट केवल नीतियों की असफलता का नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली और चुनाव जैसे लोकतंत्र के दो सबसे बुनियादी स्तंभों की पवित्रता का हो जाता है, तब वह सत्ता अपने सबसे संवेदनशील और खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुकी होती है।
# शिक्षा व्यवस्था का अवमूल्यन: भीतर से बिकता भविष्य और “कमांड चेन” का छलावा
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा महज एक राजनीतिक औपचारिकता या प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है, बल्कि यह उस संस्थागत सड़न का प्रतीक है जिसने देश के लाखों युवाओं के भविष्य को दांव पर लगा दिया। मई की शुरुआत में आयोजित देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) का कुछ ही दिनों के भीतर रद्द होना और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में यह खुलासा होना कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा नियुक्त विषय-विशेषज्ञ स्वयं इस गिरोह के सरगना निकले, यह बताता है कि सेंधमारी बाहर से नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर से हुई थी। यही गिरोह वर्ष 2025 में भी परीक्षा की पवित्रता को तार-तार कर चुका था।
हैरानी इस बात की थी कि लगातार दूसरे वर्ष देश का भविष्य बिकने के बावजूद सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया किसी नैतिक जिम्मेदारी को स्वीकार करने की नहीं, बल्कि “कमांड चेन में चूक” जैसे bureaucratic jargons (नौकरशाही के जुमलों) के पीछे छिपने की थी। परीक्षा को दोबारा कराने, वायुसेना के विमानों से प्रश्नपत्र ढोने और पूरे देश में टेलीग्राम जैसी संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाने जैसे हथकंडे भी छात्रों के उस सुलगते गुस्से को शांत नहीं कर पाए, जिसने अंततः जंतर-मंतर पर एक नया, गैर-पारंपरिक और विद्रोही युवा आंदोलन खड़ा कर दिया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि इसे न तो पारंपरिक राजनीतिक दलों का मुखौटा बताकर खारिज किया जा सकता था और न ही राष्ट्रविरोधी ताकतों का नाम देकर आसानी से दबाया जा सकता था। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बात की मुहर थी कि जब युवा वर्ग भय की बैसाखियों को फेंककर सड़क पर उतर आता है, तो अजेय से अजेय सत्ता को भी झुकना पड़ता है।
# निष्पक्षता पर गहराता संशय: मुख्य चुनाव आयुक्त और संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण
यदि प्रधान की विदाई प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम थी, तो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल पर उठते सवाल सीधे तौर पर भारतीय लोकतंत्र की नीयत और उसकी तटस्थता की धज्जियां उड़ाते हैं। फरवरी 2025 में उस विवादास्पद कानून के तहत उनका चयन किया गया, जिसने चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर कार्यपालिका यानी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को बहुमत प्रदान किया था। उस समय विपक्ष द्वारा उठाए गए आपत्तियों के स्वरों को ‘राजनीतिक कोलाहल’ कहकर दरकिनार कर दिया गया था।
किंतु, सितंबर और अक्टूबर के घटनाक्रमों ने उस नीतिगत फैसले के भयावह परिणामों को देश के सामने ला खड़ा किया। चुनाव आयोग के भीतर से जो रिपोर्ट्स बाहर आईं, वे अभूतपूर्व थीं। आयोग के अन्य दोनों आयुक्तों—सुखबीर संधू और विवेक जोशी—द्वारा दस महीनों में कम से कम 14 बार यह लिखित आपत्ति दर्ज कराना कि आयोग के महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए जा रहे हैं, लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय है। मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) में करोड़ों मतदाताओं के नाम काटे जाने के आरोप, फॉर्म 6 में पूर्वजों के विवरण जैसी जटिल शर्तें चुपचाप जोड़े जाने की साजिशें, और पश्चिम बंगाल में 16 लाख से अधिक अपीलों को बिना साथी आयुक्तों की मंज़ूरी के आगे बढ़ाना—ये सब ऐसे कृत्य हैं जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से संशय के घेरे में लाते हैं।
अक्टूबर के शुरुआती दिनों में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को खुली अदालत में यह टिप्पणी करने के लिए विवश होना पड़ा कि अदालत ने फॉर्म 6 में किसी भी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है और रिकॉर्ड से यह जांचा जाएगा कि यह बदलाव किसने किया—यह किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए अत्यंत लज्जाजनक स्थिति है। इसके बावजूद, सरकार का रवैया इस संस्थागत गरिमा को बचाने के बजाय एक ढाल बनकर उस त्रुटिपूर्ण निर्णय को बचाने का रहा है। संसद में महाभियोग या निष्कासन के नोटिसों को खारिज करना और मुख्य चुनाव आयुक्त से सवाल पूछने वाले सांसदों को बैरिकेड्स और पुलिस बसों में ठूंसना यह साबित करता है कि सरकार अब संस्थाओं की साख से अधिक अपने राजनीतिक नियंत्रण को सर्वोपरि मान रही है।
# डर के तिलिस्म का टूटना और Gen Z का वैचारिक विद्रोह
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य का सबसे क्रांतिकारी पहलू भारतीय समाज, विशेषकर युवा पीढ़ी (Gen Z) के भीतर से भय के आवरण का सदा के लिए विसर्जित हो जाना है। अब तक शासक वर्ग की यह सुस्थापित कार्यशैली रही है कि विरोध करने वाले हर व्यक्ति या समूह को हाशिए पर धकेल दिया जाए, उसे हताश कर दिया जाए या राज्य की दमनकारी मशीनरी का भय दिखाकर चुप करा दिया जाए। किंतु, जंतर-मंतर पर उभरे उस आंदोलन ने, जिसने खुद को तंज कसते हुए “कॉकरोच जनता पार्टी” का नाम दिया और उसी उपेक्षा को अपना वैचारिक हथियार बनाया, यह सिद्ध कर दिया है कि नई पीढ़ी अब दमन के भय से संचालित नहीं होती।
प्रधान के इस्तीफे के बाद “जंतर-मंतर 2.0” के बैनर तले मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय करने के लिए उठ खड़े हुए कदम यह बताते हैं कि राजनीति में एक बार झुकना विरोधियों के लिए अगली बड़ी मांगों का आमंत्रण बन जाता है। इसके साथ ही, विपक्ष की राजनीतिक ज़मीन पर भी एक गुणात्मक परिवर्तन आया है। अब तक सरकार के पास यह सहूलियत हुआ करती थी कि वह विपक्ष के हर आरोप को “चुनावी हार से उपजी झुंझलाहट” कहकर खारिज कर दे। लेकिन आज विपक्ष के तरकश में केवल राजनीतिक जुमले नहीं हैं; उनके पास सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां हैं, केंद्रीय जांच एजेंसियों के दस्तावेज हैं, और खुद चुनाव आयुक्तों की कलम से लिखी गई असहमति की फाइलें हैं। बंगाल या असम जैसे राज्यों के चुनावी नतीजे भी उस गंभीर वैचारिक और संस्थागत शोर को दबाने में असमर्थ हैं, जो इस व्यवस्था की रीढ़ को हिला रहा है। जब किसी शासन की जीत अपने ही रेफरी की संदिग्ध निष्पक्षता पर टिकी दिखने लगे, तो वह जीत अपनी ताक़त खोकर उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
# इतिहास के आईने में वर्ष 2026
सत्तारूढ़ दल के रणनीतिकार यह तर्क दे सकते हैं कि संसद में उनके पास प्रचंड बहुमत है, राज्यों के चुनाव उनके पक्ष में जा रहे हैं, और विपक्ष के पास मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए आवश्यक संख्या बल नहीं है। तकनीकी रूप से यह तर्क भले ही सही प्रतीत हो, किंतु इतिहास गवाह है कि सत्त्ता का पतन कभी भी केवल आंकड़ों के कम होने से शुरू नहीं होता। उसका पतन तब आरंभ होता है जब उसका नैतिक अधिकार (Moral Authority) चुक जाता है, जब देश की सर्वोच्च अदालतें उसके फैसलों पर सीधे सवाल उठाने लगती हैं, जब उसके अपने अधिकारी फाइलों पर असहमति दर्ज करने का साहस जुटा लेते हैं, और जब सड़क पर खड़ा आम नागरिक उससे भय खाना बंद कर देता है।
वर्ष 2026 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में उस मोड़ के रूप में दर्ज हो रहा है जहाँ अजेय समझी जाने वाली सत्ता की दीवारों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। धर्मेंद्र प्रधान की विदाई महज़ एक ईंट का खिसकना था; ज्ञानेश कुमार के प्रकरण पर सर्वोच्च न्यायालय की पैनी नज़र, संसद की पटल पर सुलगते प्रस्ताव और सड़कों पर आंदोलित जनसमूह यह तय करेंगे कि इस व्यवस्था के महल की अगली ईंट कब और कैसे गिरती है। सरकार चाहे जितना आवरण ओढ़ ले, यह वर्ष इस यथार्थ को रेखांकित करेगा कि लोकतंत्र की प्राण-वायु भय के अंधेरे में नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति के उजाले और संस्थाओं की पवित्रता में ही जीवित रह सकती है।