नरेश सोनी
रांची। झारखंड की सरकारी और अर्ध-सरकारी विभागों में व्यापक पैमाने पर आउटसोर्सिंग व्यवस्था लागू किए जाने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक पोस्ट में दावा किया गया है कि पूरे राज्य के सरकारी तंत्र को आउटसोर्सिंग कंपनियों के हवाले कर दिया गया है, जिससे आम जनता और कर्मियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
यह पोस्ट झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता मनोज मेंगो मेंन के सोशल मीडिया हैंडल से लिया गया है, जिसमें लिखा गया है कि—
“सफाई कर्मी जैसे छोटे पदों के लिए भी 50 हजार से 1 लाख रुपये तक की घूस ली जाती है, और नियुक्ति के बाद भी महीनों वेतन नहीं दिया जाता।”
इस पोस्ट में झारखंड के आदिवासी महापुरुषों — बिरसा मुंडा, सिद्धू-कानू और शिबू सोरेन — का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन महापुरुषों ने जिस महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया था, आज पूरा प्रदेश फिर से महाजनी ढांचे में धकेल दिया गया है।
पोस्ट में प्रदेश की स्थिति को लेकर व्यथा जताई गई है—
“जनता त्रस्त, नेता मस्त”
यह टिप्पणी न केवल प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि राज्य में बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और असमानता की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया का इंतजार:
इस गंभीर आरोप पर अभी तक राज्य सरकार अथवा संबंधित विभाग की कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया पर इस विषय पर बहस तेज हो गई है।
नोट: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर संकलित है। आरोपों की पुष्टि संबंधित विभागों की आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकेगी।