ओडिशा की बेटी थी वो, लेकिन भारत की ज़िम्मेदारी,
किताबों में POSH Act की बातें,
मगर ज़मीं पर बस लाचारी।
ICC की कुर्सियाँ थीं सजावट,
काग़ज़ों में थे फॉर्म और दस्तख़त,
पर जब शोषण ने दस्तक दी,
तो दरवाज़े सबके बंद थे बस।
क्या HOD था बहरा?
क्या प्रिंसिपल था अंधा?
या पूरा कॉलेज सिस्टम ही था,
जिसे बचाना था अपराध को, खुद को नहीं समझा
शिक्षा मंत्री चुप थे,
महिला आयोग मौन,
मुख्यमंत्री ने ट्वीट तक न किया,
क्योंकि वो बेटी ‘छोटी जाति’ से थी कौन
ABVP और SFI के झंडे उड़ रहे,
राजनीति की हवा में नारे चढ़ रहे।
पर वो माँ जिसकी बेटी अब राख बन गई,
क्या उसे आंदोलन से भी कुछ न्याय मिल गई
POSH Act क्या सिर्फ कॉरपोरेट की शोभा है?
क्या ICC कॉलेजों में बस एक ‘फाइल’ है?
क्यों एक युवती को जलना पड़ा,
ताकि सिस्टम को फिर एक चाबुक लगे?
हम चुप रह गए, तुम भी चुप रहे,
फिर कब तक बेटियाँ खुद को जलाएँगी?
ये कविता नहीं, ये चेतावनी है,
अब या तो सिस्टम जागेगा —
या फिर हर मोमबत्ती उसके ख़िलाफ़ जलेगी।
🔹 जवाब दो प्रधानमंत्री जी,
🔹 कहाँ है आपकी ‘बेटी बचाओ’ नीति?
🔹 कब तक कानून सिर्फ भाषणों में रहेंगे?
🔹 ICC और POSH Act को ज़मीन पर कब लागू करोगे।
Soumya की चिता की आग अभी ठंडी नहीं हुई है।
ये आग अब सवाल बनकर संसद तक जाएग ।
ये आवाज़, हर उस लड़की के लिए जो आज भी चुप है।
जबाव दो प्रधानमंत्री कहां हैं आपकी बेटी पढ़ाओ और बेटी बातों की नीति
कब तक ये कानून सिर्फ भाषणों में रहेंगे
जमीन पर कब लागू करोगे ?
✍️ लेखक सह संपादक : – अंशु कुमार ठाकुर सहरसा बिहार।
ये घटना हैं हैं ओडिशा राज्य की बालासौर के फकीर मोहन काॕलेज की जिसमें 12, जुलाई को न्याय मांगते मांगते जब थक गई तो वो अपने कालेज की गेट पर आत्मदाह कर ली और 14 जुलाई को भुनेश्वर के एक अस्पताल में उसकी मौत हो गई लेकिन सरकार से लेकर कानून व्यवस्था तक दोषियों को सजा नही दिला सकी जहां एक शिक्षक ही शिकारी बन जाएं और पूरें सिस्टम उसमें शामिल हो तो न्याय की उम्मीद रत्न हो जाती हैं और मौत के अलावा कोई रास्ता नही बचता ।