✍राजेश कुमार तिवारी इंडियन टीवी न्यूज़
रक्षा बंधन की तैयारियां जोरों पर: कटनी में सजा राखी का बाजार
कटनी (इंडियन टीवी न्यूज़)। भाई-बहन के प्यार और स्नेह का प्रतीक पर्व रक्षा बंधन नजदीक आते ही कटनी के बाजार रंग-बिरंगी राखियों से सज गए हैं। सावन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर बहनों में खासा उत्साह देखा जा रहा है। बाजारों में राखी की खरीदारी के लिए महिलाओं की भीड़ जुटने लगी है। बहनें अपने भाइयों की कलाई सजाने के लिए राखी की खरीदारी में जुटी हैं, वहीं दूर-दराज रहने वाले भाइयों को डाक के माध्यम से राखी भेजने का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
रक्षा बंधन हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो भाई-बहन के अटूट रिश्ते का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहनें भाइयों की लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ राखी बांधती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों को जीवन भर रक्षा करने का वचन देते हैं और उपहार भेंट करते हैं।
बाजार में राखियों की बहार
कटनी के बाजारों में राखी की दुकानें आकर्षक रूप से सज गई हैं। सेंथेटिक राखी से लेकर चांदी और सोने की राखियां तक उपलब्ध हैं। दुकानदारों के अनुसार, बाजार में पांच रुपये से लेकर सौ रुपये तक की राखियां बिक रही हैं। जड़ी राखी, डोरी राखी, लुंबा राखी, किड्स राखी और टाय राखी की मांग अधिक है, जिसमें डोरी और जड़ी राखी सबसे ज्यादा पसंद की जा रही हैं। इसके अलावा, चांदी की राखियां भी ग्राहकों को आकर्षित कर रही हैं, जिनकी कीमत एक हजार से पंद्रह सौ रुपये तक है। व्यापारी राखी की बिक्री से उत्साहित हैं और ग्राहकों की भीड़ लगातार बढ़ रही है।
रक्षा बंधन का इतिहास: भाई-बहन के प्रेम का प्राचीन पर्व
रक्षा बंधन, हिंदू धर्म में भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक पर्व, जिसका इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है। यह पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसका महत्व धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं में देखा जा सकता है। रक्षा बंधन का इतिहास न केवल सांस्कृतिक परंपराओं से बल्कि ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं से भी समृद्ध है।
पौराणिक कथाएं
रक्षा बंधन की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रमुख कथा भगवान कृष्ण और द्रौपदी से संबंधित है। महाभारत के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया तो उनकी उंगली में चोट लग गई। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। इस स्नेहपूर्ण कार्य से प्रभावित होकर कृष्ण ने द्रौपदी को हर संकट में रक्षा करने का वचन दिया। बाद में, जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब कृष्ण ने उनकी रक्षा की। यह कथा रक्षा बंधन के भाई-बहन के रिश्ते के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, यमुना ने अपने भाई यमराज को राखी बांधी थी, जिसके बदले यमराज ने उन्हें अमरता का वरदान दिया। इसीलिए रक्षा बंधन को कुछ क्षेत्रों में “यम और यमुना का पर्व” भी कहा जाता है।
ऐतिहासिक महत्व
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से रक्षा बंधन का एक प्रसिद्ध उदाहरण राजपूत रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कहानी है। 16वीं शताब्दी में, जब मेवाड़ की रानी कर्णावती पर बहादुर शाह का हमला हुआ, तब उन्होंने हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की गुहार लगाई। हुमायूं ने इस राखी का सम्मान करते हुए कर्णावती की रक्षा के लिए सेना भेजी, हालांकि वह समय पर नहीं पहुंच सके। यह घटना रक्षा बंधन के रक्षा सूत्र के महत्व को दर्शाती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
रक्षा बंधन का पर्व केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समय के साथ इसका दायरा बढ़ा। प्राचीन काल में गुरु-शिष्य, सैनिक और राजा-प्रजा के बीच भी रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा थी। आज भी यह पर्व विभिन्न समुदायों में भाई-बहन के प्रेम और विश्वास को मजबूत करने का प्रतीक है। बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों को रक्षा का वचन और उपहार देते हैं।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य
आज के समय में रक्षा बंधन का स्वरूप और व्यापक हो गया है। बाजारों में रंग-बिरंगी राखियों की बहार देखने को मिलती है, जिसमें साधारण डोरी राखी से लेकर चांदी और सोने की राखियां शामिल हैं। डाक और ऑनलाइन माध्यमों से बहनें दूर रहने वाले भाइयों को राखी भेज रही हैं। यह पर्व न केवल पारिवारिक बंधनों को मजबूत करता है, बल्कि सामाजिक एकता और प्रेम का संदेश भी देता है।
(हरिशंकर पाराशर)