दुद्धी सोनभद्र।सोनभद्र जिले के दुद्धी क्षेत्र में स्थित मां काली मंदिर आज श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि इसके पीछे की कथा दर्शाती है कि आस्था किस प्रकार लोकजीवन और परंपराओं को आकार देती है।
स्थानीय विद्वानों और बुजुर्गों द्वारा वर्णित कथा के अनुसार, बहुत समय पहले दुद्धी क्षेत्र घने जंगलों से घिरा एक आदिवासी बहुल इलाका था। यहाँ बड़ी संख्या में आदिवासी परिवार अपने पशुओं गाय और बैलों के साथ रहते थे।
कहा जाता है कि जब आदिवासी अपनी गायों को चराने के लिए जंगल में ले जाते, तो एक विशेष स्थान पर हर दिन एक गाय स्वयं ही अपना दूध बहा देती थी। यह घटना प्रतिदिन होने लगी और आदिवासी चरवाहों को अचरज हुआ। जब उन्होंने उस जगह की खुदाई की, तो वहाँ से सात पिंड प्रकट हुए।
इसे दैवीय संकेत मानकर आदिवासी समाज ने इस स्थान पर कच्चा मंदिर बनवाया और मां काली की प्रतिमा स्थापित की। समय के साथ श्रद्धा और विश्वास ने इस स्थल को भव्य मंदिर का रूप दे दिया।
आज यह मां काली मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है। यहाँ जनजातीय परंपराओं के साथ-साथ वैदिक रीति से भी पूजन-अर्चन होता है। आदिवासी समाज अपनी परंपराओं के अनुसार ढोल, नगाड़ों और नृत्य-गान के साथ पूजा करता है, जबकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी मां काली के दर्शन कर मनोकामनाएँ पूर्ण होने की कामना करते हैं।
त्योहारों और विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर मेले जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। खासकर शारदीय और चैत्र नवरात्र के दौरान यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
आज यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आदिवासी आस्था, परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है, जो दुद्धी क्षेत्र की पहचान माना जाता है।
शास्त्रों और श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां काली यहाँ आने वाले हर भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण करती हैं। चाहे कोई स्वास्थ्य, संतान, सुख-समृद्धि या सफलता की कामना लेकर आए – मां काली की कृपा स्वरूप उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य होता है। इसी विश्वास के कारण यह स्थान श्रद्धा और आस्था के साथ-साथ दिव्य चमत्कारों का साक्षी भी है।
सोनभद्र, तहसील रिपोर्टर दुद्धी, विवेक सिंह