दुद्धी सोनभद्र।दुद्धी नगर का मां काली मंदिर आज श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि इसके पीछे की प्राचीन कथा दर्शाती है कि आस्था किस प्रकार लोकजीवन और परंपराओं को आकार देती है।
स्थानीय विद्वान रिंकू मिश्रा ,कल्याण मिश्रा सहित अन्य बुजुर्गों का कथन है कि बहुत समय पहले दुद्धी क्षेत्र घने जंगलों और आदिवासी बस्तियों से भरा हुआ था। यहां के आदिवासी परिवार अपने मवेशियों गाय और बैलों व अन्य मवेशियों के साथ जीवन यापन करते थे। कहा जाता है कि जब वे अपनी गायों को चराने जंगल ले जाते, तो एक खास स्थान पर रोज एक गाय अपने आप दूध बहा देती थी। यह लगातार घटने लगी तो चरवाहे अचंभित हुए।
जब उस जगह की खुदाई की गई तो वहाँ से सात पिंड प्रकट हुए। इसे दैवीय संकेत मानकर आदिवासी समाज ने यहां कच्चा मंदिर बनाकर मां काली की मूर्ति स्थापित की। समय के साथ श्रद्धा और विश्वास ने इस जगह को भव्य मंदिर का रूप दे दिया।
आज भी यहां आदिवासी परंपराओं के साथ-साथ वैदिक रीति से नियमित पूजन-अर्चन होता है। आदिवासी समाज ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक नृत्य-गान के साथ मां की आराधना करता है वहीं दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु भी दर्शन कर अपनी मनोकामनाएँ व्यक्त करते हैं।
त्योहारों और विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर मेले का रूप ले लेता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है।
आज सोमवार से शारदीय नवरात्र का शुभारंभ हो गया है। प्रथम दिवस पर मां शैलपुत्री का विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया। इस अवसर पर मां काली मंदिर सहित नगर के अन्य देवी मंदिरों में भी सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। श्रद्धालुओं ने नारियल, चुनरी व प्रसाद अर्पित किया तथा घी से दीप प्रज्ज्वलित कर मां से मंगलकामनाएँ कीं। इस दौरान मंदिर परिसर भक्ति भाव से गूंज उठा।
श्रद्धालुओं और शास्त्रों की मान्यता है कि मां काली के दरबार में आने वाले हर सच्चे भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। चाहे स्वास्थ्य, संतान, सुख-समृद्धि हो या कार्य सिद्धि की कामना हो ,मां की कृपा से जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलता है। यही कारण है कि मां काली मंदिर आज दुद्धी ही नहीं बल्कि पूरे इलाके में आस्था, परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है।
सोनभद्र, तहसील रिपोर्टर दुद्धी, विवेक सिंह