काशी में बैकुंठ चतुर्दशी पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर स्थापना दिवस पर 12 ज्योतिर्लिंग व 101 मंदिरों के अर्पित जल से बाबा का होगा अभिषेक
Indian tv news /ब्यूरो चीफ. करन भास्कर चंदौली उत्तर प्रदेश
वाराणसी काशी में इस बार बैकुंठ चतुर्दशी (4 नवंबर) पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर का स्थापना दिवस अत्यंत भव्यता, वैदिक परंपरा और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया जाएगा। यह वही तिथि है कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, जब बाबा विश्वेश्वर के इस पवित्र ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई थी।
इस दिन को काशी के लोग केवल एक पर्व नहीं, बल्कि महादेव का महाउत्सव मानते हैं। इस बार का आयोजन कई दृष्टि से विशेष है। पहली बार काशी के सभी प्रमुख मंदिरों, 12 ज्योतिर्लिंग स्वरूपों और 101 मंदिरों से एकत्रित पवित्र जल बाबा विश्वेश्वर को अर्पित किया जाएगा।
इस वर्ष का आयोजन अब तक का सबसे भव्य और अद्वितीय माना जा रहा है. काशी के सभी प्रमुख मंदिर अन्नपूर्णा, कालभैरव, संकटमोचन, दुर्गाकुंड, तुलसी मानस, मृत्युंजय, बैजनाथ, नागेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ, रामेश्वरम और घुश्मेश्वर महादेव मंदिरों से पवित्र जल से बाबा का अभिषेक होगा।इसके अलावा वाराणसी और आसपास स्थित प्राचीन शक्तिपीठों और देवी मंदिरों जैसे दुर्गाकुंड, लहरतारा, कमच्छा, बांसफाटक और अस्सी घाट क्षेत्र के मंदिरों से भी जल बाबा को अर्पित किया जाएगा. यह जल काशी के धार्मिक वैभव का प्रतीक होगा।
हर मंदिर से यह पवित्र जल बाबा विश्वेश्वर को समर्पित किया जाएगा, जो समस्त शिवालयों और शक्तिपीठों की एकता का प्रतीक बनेगा. स्थापना दिवस पर मंदिर में 151 ब्राह्मणों द्वारा सामूहिक रुद्राभिषेक कराया जाएगा. सुबह मंगला आरती के बाद रुद्राभिषेक और श्रृंगार का कार्यक्रम प्रारंभ होगा जो दोपहर तक चलेगा
पूरे मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चारण और भक्ति गीतों की गूंज रहेगी. मंदिर में बाबा का श्रृंगार इस बार विशेष रूप से रजत और स्वर्ण आभूषणों से किया जाएगा. साथ ही चांदी के बिल्वपत्र, गुलाब, केसर और दुर्लभ पुष्पों से बाबा को सजाया जाएगा।
धार्मिक मान्यता है कि वर्ष में केवल एक दिन बैकुंठ चतुर्दशी ऐसा होता है जब भगवान शिव को तुलसी दल अर्पित किया जाता है. अन्य सभी दिनों में तुलसी अर्पण निषिद्ध है।
इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की संयुक्त पूजा होती है. कहा जाता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने भगवान शिव को तुलसी अर्पित कर बैकुंठ लोक के द्वार खोले थे. इसीलिए इसे बैकुंठ चतुर्दशी कहा जाता है।