दुद्धी सोनभद्र।(विवेक सिंह)
आस्था शक्ति उपासना का महापर्व चैत्र नवरात्रि में जईया पूजन एकम से रामनवमी तक माता के भक्ति में तल्लीन रहकर ढोल मझिरे के साथ देवी की स्तुति हवन पूजन के सानिध्य में करते हुए आस्था को सनातन परंपरा से जीवंत करने का महापर्व नवमी के दिन जिह्वा / गालों में त्रिशूल का भेदन कर हाथों में जलती आग का पात्र के साथ मातृशक्ति पितृ शक्ति के साथ जौ नौ दिन का रोपित सिर पर धारण कर सभी मंदिरों में प्रातः मत्था परम सत्ता के चरणों में टेकते हुए पहुंचे तो भक्तगणों की आस्था पूरी चरम पर था। जहां एक सुई की चुभन से शरीर सिहर उठना हो वहाँ पतली त्रिशूल रूपी लोहे से भेदन करना अपने आप में हैरतअंगेज और रोम रोम पुलकित करता है। नौ दिन व्रतधारी लोंग जब मंदिर में पहुंचे तों जईया पूजन में शामिल शामिल शक्ति के उपासक भक्तों का चरण छूकर आशीर्वाद लिया कई माता बहनों को आंचल में नौ दिनों में उपजे जौ कों भेंट किया। कई मंदिरों में घी सिर पर देवी के उपासक भक्तों कों रखकर शान्ति का आशीर्वाद प्राप्त किया। ढोल नगाड़े द्वारा आस्था को ऊर्जा प्रदान कर आसपास का वातावरण कौतूहल से परिपूर्ण रहा। सूर्योदय के साथ ही प्रातः मंदिरों में काली मैया की जय, बजरंगबली की जय, दुर्गा माता की जय आदि के जमकर नारों से पूरन नगर क्षेत्र घंटा, घड़ियाल, शंख ध्वनि के बीच उल्लास उमंग आस्था में शराबोर रहा। कई मंदिरों में ही भेदन किए त्रिशूल रूपी अस्त्र कों जिह्वा से निकाला गया और छेद किए गए स्थान पर सिंदूर भरी गई और नींबू का भक्तों ने प्रयोग किया जिसे देख लोग अचंभित रह गए।