सूरत में भारी बारिश के बाद बने बाढ़ जैसे हालातों ने प्रशासन के खोखले दावों की हकीकत बयां कर दी है। एक तरफ जहां शहर का आम नागरिक घुटनों तक भरे गंदे पानी में रहने को मजबूर है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक अमला जमीनी हकीकत समझने के बजाय केवल ‘कागजी और रस्मी’ दौरों तक सीमित नजर आ रहा है।हाल ही में लिंबायत जोन के मीठी खाड़ी प्रभावित इलाकों का एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसने सूरत नगर निगम (SMC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।हाई-प्रोफाइल दौरा, जमीनी स्तर पर शून्य असरस्थिति का जायजा लेने के लिए शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव श्री मिलिंद तोरवणे (IAS), सूरत की प्रभारी सचिव श्रीमती शालिनी अग्रवाल (IAS) और सूरत के नगर निगम आयुक्त श्री एम. नागराजन (IAS) जैसे आला अधिकारियों ने लिंबायत जोन का दौरा किया। इन अधिकारियों ने मीठी खाड़ी के पास बेथी कॉलोनी, रावनगर, कमरूनगर, माजदा पार्क, पुराना कमरूनगर और रतनजीनगर जैसे भारी प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण किया, नाव में बैठकर क्या समझेंगे जनता का दर्द? इस दौरे के बाद स्थानीय निवासियों और जमीनी विश्लेषकों में भारी आक्रोश है। लोगों का स्पष्ट कहना है कि बड़े अधिकारी लाइफ जैकेट पहनकर और नावों पर बैठकर बाढ़ग्रस्त इलाकों का चक्कर लगा रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो अधिकारी खुद पानी में उतरे बिना, सुरक्षित दूरी से केवल सर्वे कर रहे हैं, वे उस आम नागरिक की पीड़ा को कैसे समझेंगे जो चौबीसों घंटे इस बदबूदार और संक्रामक जलभराव के बीच जीने को मजबूर है?सूरत नगर निगम (SMC) की खुली पोलयह दौरा राहत पहुंचाने से ज्यादा प्रशासन की नाकामियों को उजागर करने वाला साबित हुआ है प्री-मानसून तैयारियों की विफलता करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी मीठी खाड़ी के आसपास के इलाके जलमग्न हैं।अधिकारियों की संवेदनशीलता पर सवाल जनता का मानना है कि यह केवल एक फोटो-ऑप (तस्वीरें खिंचवाने का जरिया) है, जिससे जमीनी राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।खुद ही खोली अपनी पोल अधिकारियों के इस तरह के दौरों ने यह साबित कर दिया है कि नगर निगम जल निकासी की व्यवस्था करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।निष्कर्ष सूरत की जनता को इस समय बड़ी गाड़ियों और नावों में घूमते अधिकारियों के दौरों की नहीं, बल्कि जलभराव से तत्काल परमानेंट निजात और ठोस राहत कार्यों की जरूरत है, जब तक अधिकारी वातानुकूलित कमरों और सुरक्षित नावों से बाहर निकलकर जनता के बीच नहीं आएंगे तब तक सूरत की यह जल-कथा हर मानसून में इसी तरह दोहराई जाती रहेगी।