ब्यूरो चीफ महासमुदं छतीसगढ
संतन दास मानिकपुरी
आषाढ पूर्णिमा को आज गुरु के चरणों में कृतज्ञता व्यक्त करने का सुनहरा अवसर आया है. लेकिन गुरु अगर सद्गुरु हो तो सिर्फ कृतज्ञता व्यक्त करने से काम ना चलेगा. उनके द्वारा फैलाये उजाले को जो बीज रूप में आपको मिला उसे बीज ही नहीं रहने देना है बल्कि उसे विस्तार देने के जतन एक शिष्य का परम कर्तव्य हो जाता है. संत पवन दीवान जैसे सद्गुरु का सानिध्य पाकर सैकड़ो और हजारों की संख्या में उनके शिष्यों ने अपने जीवन में धन्यता को प्राप्त किया. शांति और आनंद की दिव्य अनुभूति का स्वाद जिन्होंने अपने शिष्यों को चखाया ऐसे परम सद्गुरु संत पवन दीवान के श्रीचरणों के वंदन का आज दिवस है.
हँसता, नाचता, गीत गुनगाता और बांसुरी बजाता हुआ कृष्ण का धर्मं ही आज के इस बहिर्मुखी युग में मानवता के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकता है अपनी इसी देशना को व्यापक विस्तार देते हुए संत पवन दीवान ने भक्तिमार्ग की सुगम और सुन्दर पथ का चयन किया. जिसमे ह्रदय की निर्मलता और निष्कलंकता ही एक मात्र शर्त होता है. जिससे छलांग आसानी से और निश्चित ही लग जाया करता है. पीड़ा से कराह रही मानवता को वे असहाय नहीँ छोड़ने और भक्ति रस में सरोबार करने कृष्ण नाम की धुनी रचाने के जतन से सन्यासी का जीवन को आत्मसात कर भी संसार के बीच में ही रहने का निर्णय उन्हें भगौड़ा वाला सन्यासी नही बल्कि उत्पादक सन्यासी के कोटि का संत की श्रेणी में स्थापित कर गया. एक तरह से कहे तो सन्यास को नया परिभाषा और आयाम वे दे गए. भगवान बुद्ध के बाद आदि शंकराचार्य ने सन्यास को एक नयी दृष्टिकोण दी लेकिन वह आज के समय में अनुत्पादक श्रेणी का माना जाता है. समाज पर पूर्णतः निर्भरता को संत पवन दीवान सन्यास के अनुकूल नहीं पाते थे.
संत पवन दीवान ने कृष्ण के विराट जीवन को जिसमे युद्धभूमि में गीता का सन्देश भी सम्मिलित है सर्व स्वीकार भाव से पहले आत्मसात किया और उससे स्वयं को जो स्वाद मिला उसे प्रसाद रूप में बांटने कृष्णमय हो भागवताचार्य के रूप में स्वयं को स्थापित किया. पूर्णावतार भगवान कृष्ण की कथा को तो वैसे भी कोई पूर्ण नहीं कह सकता है बावजूद संत पवन दीवान ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखा. जन-जन के मन को मथते हुए उसमे अमृत का वर्षा वे करते जाते और लोग अपने को धन्य महसूस करते कि ऐसे सद्गुरु का सानिध्य मिला जो उन्हें भाव के जगत में भींगा जाता है. बाद में यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी की जो भी उनके पास जाता है स्वयं को लगभग भूल ही जाता है. ऐसा प्रेममय विराट व्यक्तित्व के धनी थे संत पवन दीवान.
छत्तीसगढ़ की धार्मिक नगरी राजिम को अपना कर्मभूमि मानने वाले संत पवन दीवान को भगवान राजीवलोचन और भगवान कुलेश्वर महादेव की इस पवित्र भूमि से गहरा लगाव भी था. ऐसे मानो जैसे जन्म जन्मांतरों से वे इस पवित्र भूमि से जुड़ा हुआ हो. अनन्त की यात्रा में जैसे उनका सामना अनेकों बार यहाँ आना हुआ हो. महानदी की निर्मल धार कलकल करती जब उतरती थी तो कवि ह्रदय संत पवन दीवान ठहाका लगाये बिना नहीं रह सकते थे. स्वर्ण तीर्थ घाट पर जब पैरी सोढुल और महानदी संगम तट पर मिलते तो वे अविचलित इसे अपने ब्रम्हचर्य आश्रम से ऐसे निहारते रहते जैसे किसी घटना के वे साक्षी बन रहे है. समाधी जैसा आनंद वे इसे बतलाते नहीं थकते थे.
संत पवन दीवान को कृष्ण बालरूप में ही नहीं, रास रचाते हुए भी और युद्ध के मैदान में भी गीता का सार सन्देश देते हुए तथा उससे पहले कुटनीतिज्ञ के रूप में भी धर्मं के पक्ष में उनका अडिग खड़ा रहना उन्हें बड़ा मनभावन मह्सूस करा जाता था. उन्हें कृष्ण का अखंड और विराट जीवन बड़ा प्रीतिकर लगता था. जानने वाले संत पवन दीवान में ही कृष्ण चेतना का आविर्भाव होना पाते थे. भक्ति से करुणा की यात्रा में वे अखण्ड दीप की तरह अध्यात्म जगत में याद किये जाते रहेंगे. परम सद्गुरु संत पवन दीवान को आज गुरु पूर्णिमा पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि.