विशेष आलेख – जितेंद्र सूर्यवंशी ‘जीतू पटेल’, 1 जुलाई 2026_
अकरम पटेल क़ी रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के नक्शे पर बैतूल जिला यूं तो वर्षों से शांत रहा, लेकिन अब ये जिला राष्ट्रीय विकास के मानचित्र पर अपनी जगह बनाने को बेताब है। वजह साफ है। प्रकृति ने यहां कुछ भी कम नहीं छोड़ा। धरती के नीचे कोयला और खनिज, ऊपर से बहती ताप्ती, माचना, काजल, गंजाल जैसी जीवनदायिनी नदियां, साथ में सारनी का पावर हाउस और पाथाखेड़ा का कोयला। ऊपर से फोरलेन हाईवे, इटारसी जैसा रेल जंक्शन और पास में नागपुर का अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट। इतने संसाधन कम ही जिलों को नसीब होते हैं।सवाल सिर्फ एक है, इन बिखरे मोतियों को एक माला में कौन पिरोएगा?आज बैतूल की सबसे बड़ी चुनौती पानी और रोजगार की है। बरसात में नदियां लबालब और गर्मी आते ही खेत प्यासे। उद्योग को पानी चाहिए, गांव को पेयजल और खेत को सिंचाई। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए “नदी से नदी जोड़ो” की उत्कृष्ट कार्य योजना बैतूल के लिए संजीवनी साबित हो सकती है।कल्पना कीजिए। तवा से अतिरिक्त पानी उठाकर माचना बेसिन तक पहुंचे। मुलताई में ताप्ती का उद्गम संरक्षित होकर दक्षिण बैतूल के गांवों तक जाए। गंजाल और काजल का पानी स्टोर होकर सारनी-पाथाखेड़ा के उद्योगों की प्यास बुझाए। एक ही पानी से तीन काम, खेती, उद्योग और पीने का पानी। जब खेतों में तीन फसलें लगेंगी तो किसान की आय अपने आप बढ़ेगी।और जहां पानी होगा वहां उद्योग खुद आएगा। बैतूल के पास पहले से ही वो सब है जो कोई भी निवेशक देखता है। सस्ती बिजली, कोयला, समतल औद्योगिक जमीन और सबसे बड़ी बात कुशल श्रमिक। बैतूल का लड़का आज नागपुर, भोपाल, इंदौर में मजदूरी कर रहा है क्योंकि यहां अवसर नहीं है। अगर तवा-माचना लिंक के साथ सारनी में पावर इंटेंसिव इंडस्ट्री पार्क और इटारसी के पास लॉजिस्टिक्स हब बन जाए तो यही लड़का अपने घर के पास 20 हजार की नौकरी करेगा।बैतूल की लोकेशन भी इसे खास बनाती है। एक तरफ भोपाल, दूसरी तरफ नागपुर, एक ओर इंदौर तो दूसरी ओर जबलपुर। छिंदवाड़ा, नर्मदापुरम, अमरावती, खंडवा, बुरहानपुर सभी 4 से 5 घंटे की दूरी पर। मुंबई-दिल्ली का माल आज सीधे निकल जाता है। अगर बैतूल में एक बड़ा वेयरहाउसिंग और ट्रांसपोर्ट हब बन जाए तो इस ट्रैफिक का एक बड़ा हिस्सा यहां रुककर रोजगार देगा।पर्यटन की दृष्टि से भी बैतूल सोना है। ताप्ती का उद्गम मुलताई, तवा का किनारा, घने जंगल। धार्मिक और इको टूरिज्म को एक साथ जोड़कर यहां होटल, होमस्टे और स्थानीय बाजार को नई उड़ान दी जा सकती है।लेकिन ये सब तभी होगा जब इच्छाशक्ति होगी। इसके लिए एक बैतूल विकास प्राधिकरण बनाना होगा जिसमें जनप्रतिनिधि, प्रशासन और उद्योग तीनों एक मेज पर बैठें। नदी जोड़ो को सिर्फ सिंचाई योजना न मानकर इसे बैतूल की अर्थव्यवस्था का इंजन बनाना होगा। PPP मॉडल पर काम हो। जो उद्योग पानी लेगा वो नहर बनाने में भी भागीदार बने।बैतूल के पास शिकायत करने का एक भी कारण नहीं है। शिकायत सिर्फ इस बात की है कि अब तक सही दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठे। अगर अगले 3 साल में तवा-माचना लिंक, औद्योगिक भूखंड और कौशल केंद्र पर काम शुरू हो गया तो 2030 तक बैतूल मध्य प्रदेश के 5 विकसित जिलों में शुमार होगा।प्रकृति ने बैतूल को सब कुछ दिया है। अब गेंद जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और हम सब बैतूल वासियों के पाले में है। या तो हम इस अवसर को हाथ से जाने देंगे, या फिर इसे पकड़कर बैतूल को विकास की नई ऊंचाई पर ले जाएंगे।
लेखक: जितेंद्र सूर्यवंशी ‘जीतू पटेल’, स्वतंत्र विश्लेषक, मध्य प्रदेश