बारीपदा, 29 अगस्त: ओडिशा के प्रथम पुरातत्वविद्, प्रख्यात इतिहासकार, साहित्यकार और पद्मश्री परमानंद आचार्य की 132वीं जयंती बारीपदा में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। ‘आमे मयूरभंजिया’ की ओर से ‘वंदे वरपुत्रम्’ कार्यक्रम के तहत इस आयोजन का उद्देश्य महान विभूतियों के प्रति सम्मान की परंपरा को बनाए रखना था।देउलसाही स्थित परमानंद आचार्य की प्रतिमा स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में संस्कृतिप्रेमी, बुद्धिजीवी और गणमान्य लोग शामिल हुए। सभी ने उनकी प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित कर उन्हें नमन किया। इसके बाद उनके जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर परिचर्चा आयोजित की गई।कार्यक्रम में ‘आमे मयूरभंजिया’ के अध्यक्ष एवं पत्रकार संजय कुमार चौधरी ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने साहित्य, संस्कृति और इतिहास के क्षेत्र में परमानंद आचार्य के महत्वपूर्ण योगदान को याद किया। बारीपदा नगरपालिका की उपाध्यक्ष सीमा दास और इतिहासकार डॉ. श्यामसुंदर दास ने भी उनके जीवन एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।वक्ताओं ने बताया कि मयूरभंज जिले के बड़साही ब्लॉक के बैद्यपुर ब्राह्मणशासन में जन्मे परमानंद आचार्य ने पुरातात्विक अनुसंधान के माध्यम से ओडिशा के कई अनछुए ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाया। पुरातत्व के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 1964 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था।वर्ष 1928 में उन्होंने खिचिंग में संग्रहालय की स्थापना की। इसके अलावा खिचिंग के चंद्रशेखर मंदिर के पुनर्निर्माण तथा बैतरणी, ब्राह्मणी और महानदी घाटी में पुरातात्विक उत्खनन में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।इस अवसर पर कृष्णचंद्र गोलेई से जगन्नाथ मंदिर तक की सड़क का नाम ‘पद्मश्री परमानंद मार्ग’ किए जाने की जानकारी दी गई। सड़क के दोनों ओर नामपट्टिका नहीं होने पर पुनः नामपट्टिका लगाने का अनुरोध नगरपालिका उपाध्यक्ष से किया गया।कार्यक्रम के अंत में शिक्षाविद् श्रीनिवास भंज ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
मयूरभंज से हिमांशु शेखर प्रहराज की रिपोर्ट।