“दीक्षारंभ समारोह 2026”: एमजीसीयू में नवागत विद्यार्थियों को मिली ज्ञान, संस्कार और आत्मविश्वास की दीक्षा
“क्या आप तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या तकनीक आपका उपयोग कर रही है?”- कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव:
“आप यहाँ पढ़ने नहीं, गढ़ने आए हैं”- मुख्य अतिथि प्रो. परमेंद्र कुमार वाजपेयी
“मनुष्य योनि, भारत भूमि पर जन्म और एमजीसीयू में अध्ययन का सौभाग्य”- विशिष्ट अतिथि प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी
मोतिहारी, 16 सितंबर। शरद ऋतु की स्वच्छ प्रभात में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय का महात्मा गांधी सभागार आज ज्ञान, संकल्प और आशीर्वचनों की त्रिवेणी से आप्लावित हो उठा, जब “दीक्षारंभ समारोह 2026” के अंतर्गत नवागत विद्यार्थियों का भावभीना स्वागत किया गया। स्नातकोत्तर एवं नवसंचालित पाँच वर्षीय एकीकृत पाठ्यक्रमों में प्रवेश ले रहे सैकड़ों विद्यार्थी इस अविस्मरणीय अवसर के साक्षी बने, जो उनके जीवन के एक नूतन अध्याय का शुभारंभ था।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने की। मुख्य अतिथि के रूप में जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा के कुलपति प्रो. परमेंद्र कुमार वाजपेयी तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी ने समारोह की गरिमा को बढ़ाया। शैक्षणिक मामलों के निदेशक प्रो. शिरीष मिश्रा के सारगर्भित स्वागत भाषण से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
“शॉर्टकट मत अपनाइए, परिश्रम से भाग्य गढ़िए” — कुलानुशासक प्रो. प्रसून दत्त सिंह
कुलानुशासक प्रो. प्रसून दत्त सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज उनके सामने वे ही संकल्प साकार खड़े हैं, जिन्हें लेकर वे यहाँ तक की यात्रा तय करके आए हैं — और इन संकल्पों में कभी विचलन नहीं आना चाहिए। उन्होंने इस अवसर को “जीवन-निर्माण का पावन क्षण” निरूपित करते हुए आत्म-संयम, सुचिता, बुद्धि की उर्वरता और गुरु-वंदना को विद्यार्थी जीवन की आधारशिला बताया। उनके शब्दों में दृढ़ता झलकती रही: “शॉर्टकट मत अपनाइए। परिश्रम से ही आप भाग्य का निर्माण कर सकते हैं।”
“मनुष्य योनि, भारत भूमि पर जन्म और एमजीसीयू में अध्ययन का सौभाग्य” — प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी
विशिष्ट अतिथि प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी ने अपने ओजस्वी वक्तव्य में विद्यार्थियों का आह्वान किया कि उन्हें तीन बातों पर गौरव का अनुभव होना चाहिए — मनुष्य योनि में जन्म, भारत भूमि पर जन्म, और एमजीसीयू में अध्ययन का दुर्लभ सौभाग्य। उन्होंने 2047 के विकसित भारत के स्वप्न को साकार करने में विद्यार्थियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्हें “लेने वाला नहीं, देने वाला” बनने की प्रेरणा दी। जीवन का उद्देश्य निर्धारित करना ही सर्वोपरि कर्तव्य है, यह प्रतिपादित करते हुए उन्होंने अपना उद्बोधन “हरिओम” के दिव्य उद्घोष के साथ विराम दिया।
“आप यहाँ पढ़ने नहीं, गढ़ने आए हैं” — प्रो. परमेंद्र कुमार वाजपेयी
मुख्य अतिथि प्रो. परमेंद्र कुमार वाजपेयी का उद्बोधन समारोह का हृदय-स्थल सिद्ध हुआ। उन्होंने कहा कि बड़ी-बड़ी बातें करना सहज है, परंतु छोटी-छोटी बातों को जीवन में उतारना और उनमें निरंतरता बनाए रखना ही सफलता की सच्ची कुंजी है। संस्कृत के एक गीत “संघे शक्ति कलौ युगे” का स्मरण कराते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया, “अकेले नहीं, एक साथ बैठिए। एक साथ बढ़िए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्यार्थी यहाँ केवल उपाधि अर्जित करने नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण और ज्ञानार्जन हेतु आए हैं — क्योंकि श्रद्धा के बिना ज्ञान संभव नहीं, और सीखना जीवनपर्यंत चलने वाली साधना है। “काग चेष्टा” के प्राचीन दृष्टांत से सतत परिश्रम की प्रेरणा देते हुए उन्होंने विद्यार्थियों से “विवेकवान” नहीं, “प्रज्ञावान” बनने का आह्वान किया। नई पीढ़ी को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विभाजन की सोच त्यागकर सकारात्मकता अपनाई जाए और किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर ऐसा विश्व गढ़ा जाए, जो विकृतियों से रहित हो। उन्होंने अंत में आह्वान किया कि ज्ञान को व्यवहार में उतारकर विकसित भारत का निर्माण किया जाए और विश्व को नई दिशा दी जाए।
“क्या तकनीक आपका उपयोग कर रही है?” — कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव
कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने बताया कि इस वर्ष विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की भावना के अनुरूप 12 विषयों में पाँच वर्षीय एकीकृत स्नातक-स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम आरंभ किए हैं, जिनमें कंप्यूटर साइंस में बी.टेक-एम.टेक तथा समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी में बीए-एमए पाठ्यक्रम सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त हिंदू स्टडीज़ में एमए, फूड एंड एग्रीबिज़नेस में एमबीए तथा गांधीयन एंड पीस स्टडीज़ में एमए जैसे नवीन स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम भी इस वर्ष प्रारंभ किए गए हैं।
भारत द्वारा हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न ब्रिक्स सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कुलपति ने प्रधानमंत्री के “तकनीक के हथियारीकरण” संबंधी सचेत करने वाले वक्तव्य का स्मरण कराया और विद्यार्थियों से एक प्रश्न सदैव अपने साथ रखने का अनुरोध किया — “क्या आप तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, या तकनीक आपका उपयोग करना शुरू कर चुकी है?”
आभासी दुनिया की चमक-दमक की तुलना में वास्तविक जीवन के सौंदर्य को प्राथमिकता देने की सीख देते हुए उन्होंने कहा, “आभासी दुनिया आपको लाखों लोगों से जोड़ सकती है, परंतु वह आपके बगल में बैठे व्यक्ति का स्थान कदापि नहीं ले सकती।” डिजिटल पीढ़ी के लिए उन्होंने एक अनूठी एवं मौलिक सलाह भी दी — “बोरियत की कला” सीखने की, यह कहते हुए कि बोरियत ही रचनात्मकता और मौन विचारों की सृजनभूमि है। उन्होंने विश्वविद्यालय के शत-प्रतिशत रैगिंग-मुक्त परिसर होने की पुनःपुष्टि की तथा आगामी मध्य-सत्रीय परीक्षा हेतु अनिवार्य 75% उपस्थिति का स्मरण कराया।
कार्यक्रम के समापन पर विशिष्ट कार्य अधिकारी (प्रशासन) प्रो. अतुल कुमार शरण ने भावपूर्ण धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का सुरुचिपूर्ण संचालन समाजशास्त्र विभाग की सह-प्राध्यापिका डॉ. श्वेता ने किया।
रिपोर्ट:अमरजीत सिंह