तरंग गुप्ता, पत्रकार
हरदोई
शाहाबाद/हरदोई।
पाली रोड स्थित ग्लोबल हॉस्पिटल एंड मैटरनिटी सेंटर में जुड़वा बच्चों की मौत के बाद अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले में अस्पताल के डॉक्टर द्वारा कथित तौर पर यह स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है कि दोनों बच्चों की मौत गर्भ में ही हो चुकी थी। इसके बावजूद महिला को अस्पताल में भर्ती किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब बच्चों की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी, तो भर्ती और उपचार की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई और मरीज से किस आधार पर शुल्क लिया गया।
बताया जा रहा है कि इससे पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र शाहाबाद से महिला और परिजनों को बेहतर उपचार के लिए किसी अच्छे अस्पताल में जाने की सलाह दी गई थी। इसके बाद परिजन ग्लोबल हॉस्पिटल पहुंचे, जहां जुड़वा बच्चों की मौत का मामला सामने आया।
मामले में यह आरोप भी सामने आया है कि घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन की ओर से पीड़ित परिवार को समझाकर कुछ लिखित दस्तावेज लिए गए। परिजनों का कहना है कि परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि अस्पताल संचालक ने अपनी निजी गाड़ी से पीड़ित को घर तक भिजवाया और अस्पताल का कुछ शुल्क माफ किए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
मामले का एक और पहलू अस्पताल में लगे बोर्ड पर दर्ज डॉक्टरों के नाम और उनकी योग्यता को लेकर उठ रहे सवाल हैं। परिजनों और स्थानीय लोगों की ओर से आरोप लगाया गया है कि बोर्ड पर जिन चिकित्सकों के नाम और डिग्रियां प्रदर्शित की गई हैं, उनकी वास्तविक भूमिका और अस्पताल से संबद्धता की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही यह भी जांच का विषय है कि अस्पताल में मरीजों का उपचार वास्तव में किन चिकित्सकों द्वारा किया जा रहा है और उनके पास आवश्यक योग्यता एवं वैध पंजीकरण है या नहीं।
पत्रकारों द्वारा मामले को लेकर सवाल किए जाने के दौरान पीड़ित परिवार की ओर से अपनी बात रखने की कोशिश की गई, लेकिन अस्पताल के अंदर बातचीत के बाद परिवार की ओर से कैमरे पर खुलकर बयान देने से परहेज किया गया। इससे भी मामले को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं।
हालांकि अस्पताल पर लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। जांच में अस्पताल में चिकित्सकों की नियुक्ति, उनकी शैक्षिक योग्यता एवं पंजीकरण, मरीज की भर्ती से लेकर उपचार तक के रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज, बिल तथा परिजनों से लिए गए लिखित दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी है। यदि निजी अस्पतालों में चिकित्सकों की योग्यता, पंजीकरण और मरीजों के उपचार की नियमित जांच होती है तो ऐसे सवाल सामने क्यों आ रहे हैं? स्थानीय लोगों का कहना है कि विभाग को केवल कागजी रिकॉर्ड देखने के बजाय अस्पताल में मौके पर जाकर वास्तविक व्यवस्थाओं की भी जांच करनी चाहिए।
जुड़वा बच्चों की मौत से पहले से ही दुखी परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों की सच्चाई जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। अब निगाहें स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं कि मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाती है या नहीं।
तरंग गुप्ता जिला संवाददाता
ITN NATIONAL NEWS HARDOI