
शिक्षक हितों पर दावों की नहीं, जवाबदेही की परीक्षा हैं।
उन्होंने कहा कि शिक्षक समाज के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है,यदि शिक्षकों के सभी प्रमुख मुद्दों का समाधान हो चुका है, तो पुरानी पेंशन, सेवा सुरक्षा, वित्तविहीन शिक्षकों के मानदेय और कैशलेस चिकित्सा जैसे मुद्दों पर आज भी अपेक्षाएँ क्यों बनी हुई हैं?
भाजपा की सरकार होने के बावजूद इन मुद्दों पर अपेक्षित समाधान कितना हुआ, इसका जवाब शिक्षकों को मिलना चाहिए। केवल उपलब्धियों के दावे पर्याप्त नहीं, उनका प्रमाण और धरातलीय परिणाम भी आवश्यक हैं।
आज शिक्षक समाज को तय करना है कि वह राजनीतिक दावों पर विश्वास करेगा या अपने हितों के लिए संघर्ष करने वाले प्रतिनिधियों और संगठनों के कार्यों का मूल्यांकन करेगा।
शिक्षक निर्वाचन में जाति और दल से ऊपर उठकर पुरानी पेंशन, सेवा सुरक्षा, सम्मानजनक मानदेय और शिक्षक हितों को प्राथमिकता दें। जो प्रतिनिधि शिक्षकों की आवाज बनें, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करें और जवाबदेही निभाएँ, उन्हीं को समर्थन दें।
याद रखिए,शिक्षक हित भाषणों से नहीं, संघर्ष, प्रतिबद्धता और ठोस परिणामों से सुरक्षित होते हैं।
शिक्षक क्षेत्र से ऋतिका दुबे पहली महिला उम्मीदवार है उनके साहस निष्ठा लगन और मेहनत को शिक्षकों का साथ मिल रहा है। उन्होंने शिक्षकों से प्रथम वरीयता के मत प्रदान करने का अनुरोध किया।
