बारीपदा: शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र सीमा नहीं होती। दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और कुछ नया सीखने का जुनून हो तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर शिक्षा का नया अध्याय शुरू किया जा सकता है। इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण बारीपदा नगरपालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर 21 निवासी 79 वर्षीय बंशीधर बारिक ने प्रस्तुत किया है।अपने लंबे कार्यकाल के दौरान राउरकेला स्थित एक औद्योगिक संस्थान में नौकरी करने के बाद सेवानिवृत्त हुए श्री बारिक ने आज भी शिक्षा के प्रति अपना उत्साह और लगाव बरकरार रखा है। उन्होंने सेवानिवृत्ति के जीवन को नई जानकारियां और ज्ञान अर्जित करने का अवसर बनाया है। इसी उद्देश्य से उन्होंने इस उम्र में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के अंतर्गत अंग्रेजी ऑनर्स स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लेकर अपनी नई शैक्षणिक यात्रा शुरू की है।अंग्रेजी भाषा में अधिक ज्ञान एवं दक्षता हासिल करने के उद्देश्य से श्री बारिक ने शिक्षाविद्, कवि, लेखक एवं प्रेरणादायी वक्ता कविश्री डॉ. राजेंद्र दास के बारे में जानकारी प्राप्त की और उनसे संपर्क किया। अंग्रेजी भाषा सीखने तथा पढ़ाई से संबंधित आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए उन्होंने डॉ. दास के साथ विस्तार से चर्चा की।विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि 79 वर्ष की उम्र में भी श्री बारिक स्वयं को एक नए विद्यार्थी के रूप में तैयार करने के लिए उत्साहित हैं। उन्होंने डॉ. दास को ‘सर’ कहकर संबोधित करते हुए उनसे सीखने की इच्छा जाहिर की। उनका यह विनम्र भाव इस मुलाकात को और भी यादगार बना गया।इस अनुभव के संबंध में डॉ. राजेंद्र दास ने कहा कि जीवन के इस पड़ाव पर भी श्री बारिक का शिक्षा के प्रति अटूट लगाव और सीखने की भावना उन्हें गहराई से प्रभावित कर गई है। उन्हें अंग्रेजी भाषा की शिक्षा एवं अध्ययन के क्षेत्र में मार्गदर्शन देना उनके लिए सम्मान के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है।वर्तमान समय में विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई के प्रति एकाग्रता, धैर्य और नियमितता की आवश्यकता पर लगातार चर्चा हो रही है। ऐसे समय में श्री बारिक का यह कदम समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया है। उनका प्रयास युवा पीढ़ी को अपनी पढ़ाई के प्रति अधिक गंभीर, एकाग्र और उत्साही बनने की प्रेरणा देगा।शिक्षा केवल नौकरी पाने या डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जीवनभर ज्ञान अर्जित करने की एक सतत यात्रा है। उम्र नहीं, बल्कि सीखने की इच्छाशक्ति ही इंसान की वास्तविक पहचान होती है। 79 वर्षीय बंशीधर बारिक की यह नई शैक्षणिक यात्रा समाज को यही महत्वपूर्ण संदेश दे रही है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।
मयूरभंज से हिमांशु शेखर प्रहराज।
