उम्मेद जोया नाडोल पाली इण्डियन टीवी न्यूज
कभी करघों की खनक, मशीनों की गूंज और रंगाई–छपाई की खुशबू से पहचानी जाने वाली कपड़ा नगरी पाली आज खामोशी के अंधेरे में डूबी हुई है।
दीपोत्सव के बाद कुछ ही दिनों तक चली औद्योगिक इकाइयाँ अब लगातार 53 दिनों से ठप पड़ी हैं।
ट्रीटमेंट प्लांट संख्या 6 (Z L D) और टर्सरी तक ट्रीटमेंट प्लांट संख्या 4 के बंद होने से औद्योगिक पहियों की रफ्तार थम गई है।
मशीनों की आवाज़ लुप्त हो चुकी है, और कारखानों के फाटक उदासी के साथ बंद पड़े हैं।
करीब एक महीना तेईस दिन से उत्पादन रुकने का दर्द सिर्फ़ मालिकों तक सीमित नहीं है यह पूरे शहर की सांसों में घुल गया है। उद्योगपति इंतज़ार की इंतिहा पर हैं ।
“आख़िर कब तक
इसी मायूसी में कपड़ा व्यवसायी दूसरे बाज़ारों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
पाली का नाम, जो कभी देश भर में रंगाई–छपाई की पहचान था, आज बेनामी होने के कगार पर खड़ा है।
“सन्नाटों ने लिख दी है फ़ैक्ट्रियों की तक़दीर,
रौशन शहर था कल तक, आज हर सिम्त अंधेर।”
दूसरी ओर, सबसे ज़्यादा मार पड़ी है श्रमिकों पर।
रोज़गार छिनते ही घरों के चूल्हे ठंडे पड़ गए हैं।
मेहनत के बदले पसीना बहाने वाले हाथ आज बेकारी की बेबसी थामे खड़े हैं।
खाने को फांके, बच्चों की पढ़ाई की चिंता, और किराये एवं दवाइयों का बोझ जीवन यापन दुश्वार हो चला है।
यह सिर्फ़ आर्थिक संकट नहीं, यह इंसानियत की परीक्षा है।
“रोज़ी के चराग़ बुझें तो घर रोशन कैसे हो,
मजबूरियों के शहर में इंसान ख़ामोश कैसे हो।”
यह वक्त जवाबदेही और तत्काल समाधान का है।
ट्रीटमेंट प्लांटों को शीघ्र चालू कर उत्पादन बहाल किया जाए, ताकि उद्योग भी बचे और श्रमिकों की रोटी भी।
पाली की पहचान, उसकी मेहनत और उसकी रूह सब दांव पर हैं।
अगर आज फ़ैसले नहीं हुए, तो इतिहास लिखेगा कि कपड़ा नगरी पाली को अंधेरे ने नहीं, देरी ने किया है ग्रास
अकरम खान पाली