ब्यूरो चीफ सुंदरलाल
हिमाचल प्रदेश के सभी पवित्र तीर्थ स्थल भारत के प्राचीन ऋशि-मुनियों के नामों से जुडे़ हैं और आज तक जनता पर उनकी अमित छाप दिखाई देती है। स्वर्ग के समान गौरव प्राप्त इस भूमि को देवभूमि भी कहा गया है। प्राचीन काल से ही यह भूमि देवताओं, योगियों और ऋशि-मुनियों के चिंतन की कहानियां कहती रही है प्रदेश के प्रत्येक गांव व कस्बे में किसी न किसी देवी या देवता के वास या उससे सम्बन्धित होने के कारण यहां पर वर्ष भर मेले लगते रहते हैं।
इसी तरह का एक पवित्र स्थल सोलन जिले की कसौली तहसील के अंतर्गत श्रद्धालुओं व पर्यटकों का मनमोहने वाला महलोग क्षेत्र में है जहां पर हर तीसरे वर्ष दो सप्ताह तक चलने वाला मेला (कुम्भ) लगता है। यह प्रदेश का सबसे बड़ा मेला है।
जोहड़ जी (महलोग) साहिब के प्रबंधकं प्रितकौर बाबाजी महाराज के अनुसार इस वर्ष यह मेला 2 अप्रैल से परम्परागत अरदास के साथ आरम्भ हो गया है। पहला सप्ताह देशी तथा दूसरा सप्ताह पहाड़ी संगत के नाम रहता है। [2 से१५अप्रैल) तक संगत (श्रद्धालु) देश दोआबा, 6.से 7 अप्रैल) तक संगत नालागढ़, रोपड़, चंडीगढ़ तथा हरियाणा 8से.9 अप्रैल) तक संगत अर्की-बाघल तथा 10 से13 अप्रैल तक संगत महलोग, कुठाड़, बेज्जा, पटियाला तथा बाकी सारी पहाड़ी रियासतों (इलाकों) के श्रद्धालु दर्शनार्थ पहुंचेंगे।
एक जनश्रुति के अनुसार ऐसी मान्यता है कि 15वीं शताब्दी में इस स्थल पर एक बहुत बड़ा खूंखार कौड़ा नामक राक्षस रहता था, जिसने पूरे क्षेत्र में आतंक मचा रखा था। वह मनुश्यों को गर्म तेल के कड़ाह में भूनकर खा जाया करता था। एक बार जब गुरू नानक देव जी के दो प्रिय शिष्य बाला व मरदाना इस क्षेत्र में विचरण कर रहे थे तो एक शिष्य (मरदाना) को कौड़ा राक्षस ने बंदी बना दिया। राक्षस मनुष्यों को भूनने से पहले कड़ाह की परिक्रमा करवाता था फिर भूनकर खा जाता था। मरदाना ने परिक्रमा करते समय गुरू नानक देव जी का ध्यान किया तो वे वहां पर प्रकट हो गए। इस पर राक्षस और भी खुश हुआ कि आज उसे दो-दो शिकार प्राप्त हुए हैं। राक्षस ने गुरू नानक देव जी को भी परिक्रमा करने को कहा।इस पर गुरू जी ने भोले बनकर कहा कि उन्हें परिक्रमा नहीं आती तथा वह स्वयं (राक्षस) ऐसा करके बताए। राक्षस ने परिक्रमा लगानी षुरू की तो गुरू नानक देव जी ने जैसे ही उसे हाथ लगाया तो राक्षस गर्म तेल के कड़ाह में गिर गया। राक्षस ने अपना अंतिम समय निकट देख गुरू नानक देव से प्रार्थना की कि उसकी मृत्यु के उपरान्त उसे भी याद रखा जाए। इस प्रकार उस खूंखार राक्षस का नाष हो गया। इस महिमा को सुनकर बाबा कर्म चन्द जो इससे पूर्व पपलोगी में रहते थे, वहां पहुंचे तथा यहां अपना निवास स्थान बनाया। जिस स्थान पर राक्षस का वध किया गया था वहां पर बाबा जी ने अपना निशान [झंडा) स्थापित किया तथा जहां पर राक्षस का कड़ाह था वहां पर बाबा जी ने अपने बैठने का स्थान बनाया और जहां गुरू नानक देव ने राक्षस को मारने के बाद विश्राम किया था वहां पर साधु-महात्माओं के ठहरने के लिए जगह बनाई तभी से हर तीसरे वर्ष गुरू नानक देव जी की फतेह की याद में बहुत बड़ा मेला लगता है जो आजकल जिला सोलन का सबसे बड़ा मेला है।
एक अन्य मान्यता अनुसार सिखों के गुरू अमर दास जी ने 22 मंजियां बख्सीयां जिनमें नौंवी मंजी पर देहरा जोहड़जी में बाबा गंगदास जी विराजमान रहें उनकी अगली पीढ़ी में बाबा करम चन्द जी हुए जिनकी सामध साहिब जोहड़ जी में है इसी तरह श्री गुरूगंग दास जी, श्री गुरू खडग सिंह जी, श्री गुरू जवाहर सिंह जी तथा बाबा करम चन्द जी की देहरा साहिब की शक्ति से यह पवित्र अस्थान भरपूर है।
मेला जोहड़जी साहिब के प्रबन्धक बाबाओमकार प्रितकौर जी महाराज (हाल देहरा हरीपुर साहिब) ने देश दोआबा और पहाड़ निवासी सभी भाई-बहनों से अनुरोध किया है कि गत वर्षों की भान्ति इस वर्ष भी धूमधाम से अपने मित्रों के साथ दुगर्म पहाडि़यों को पार करते हुए पतित पावन के शुभ दर्शन करके अपने चाले और कमाई को सफल बनाओ। साध संगत को सूचित किया जाता है कि इस वर्ष भी देश दोआबा के चारों लंगर पहले ही निशिचित किये जा चुके हैं यदि किसी सेवक ने लंगर देना है वह अगले चाले पर दे सकता है या पहाड़ी संगत (8 अप्रैल से 14 अप्रैल) के मौके पर दे सकता है।यह पवित्र स्थल समुद्र तल से 48 सौ फुट की ऊंचाई पर स्थित है, यहां प्राकृतिक दृश्य देखते ही मनमोहित हो जाता है। एक तरफ सुबाथु, कसौली,शिमला व ऊंची बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाएं तथा दूसरी तरफ मैदानी इलाकों में दूर हरियाणा, पंजाब व चण्डीगढ़ का नजारा देखा जा सकता है तथा रात्रि दृष्य देखते ही बनता है। कसौली व सुबाथु से यह स्थल 35 कि0मी0, नालागढ़ से 50 कि0मी0,षिमला से 80 कि0मी0, सोलन व चण्डीगढ़ से बराबर 60 कि0मी0 है।
पट्टा (महलोग) से यहां पहुँचने के दो मार्ग है। एक मार्ग कासल,बडैहरी, बभौरी होकर नौ कि0मी0 है तथा दूसरा मार्ग पट्टा या गोयला से घयान तक है तथा वहां से आगे सीधा चढ़ाई वाला रास्ता पैदल तय करना होता है। बीच में पपलोगी नामक पवित्र स्थल के भी दर्शन हो जाते हैं, जहां पर बाबा कर्मचन्द करना पड़ जी का झण्डा(निषान) व खुले मचान वाला मंदिर है।
जोहड़जी का पुराना नाम चिपीघाट है उसके पास ही बभौरी देवी का मन्दिर, स्वर्गद्वारी व जोहड़ है, जिसके कारण इसका नाम जोहड़जी पड़ा। मेले में लगभग दो-ढाई लाख के करीब श्रद्धालु अपनी मनोतियां लेकर यहां पहुंचते है। बैशाखी के अगले दिन राक्षस यानि पडियार देवाता के नाम पर बकरे की बलि दी जाती है तथा हरिपुर साहब में बाबा जवाहर सिंह की समाधि पर समपन्न होता है। मेले के दौरान गाडि़यों की पार्किंग की समस्या रहती है और गाडि़यों की मीलों लम्बी कतारें लग जाती हैं। यहां पर बस स्टैंड, रेन शेल्टर शोचालय,स्वास्थ्य केन्द्र व यात्री निवास बनाए जाने की अति जरूरत है।
मेले के दौरान सैकड़ों की संख्या में दुकानें सजती हैं। लोग विभिन्न परिधानों में सज-धज कर आते हैं। जोहड़जी के बारे में कहा जाता है कि यहां पर सच्चे दिल व श्रधा से श्रद्धालु जो भी मनौती मांगते हैं वह पूरी हो जाती है। जोहड़जी में जो जौहड़ है उसका पानी कभी भी नहीं सूखता और जब सूखने लगता है तो वर्षा अवश्य हो जाती है। इसका पानी पीने से अनेक बीमारियों व विकारों से छुटकारा मिलता है। यहां के पानी से स्नान भी शुभ माना जाता है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यहां बहुत सी सरायें बनी हैं। मेले में सुरक्षा के जिला प्रशासन ने कड़े इंतजाम किये हुए है |