नरेश सोनी इंडियन टीवी न्यूज नेशनल ब्यूरो हजारीबाग
हजारीबाग/रांची: झारखंड की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक स्थिति इन दिनों एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल गलियारों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि सार्वजनिक मंचों से तीखी आलोचना का विषय बन चुके हैं। हाल ही में अम्बा प्रसाद द्वारा व्यक्त किए गए विचार राज्य की पुलिसिंग और प्रशासनिक ढांचे पर एक गहरा कटाक्ष करते हैं। झारखंड, जो अपनी प्राकृतिक संपदा और ‘जल-जंगल-जमीन’ के गौरवशाली नारों के लिए जाना जाता है, आज कथित तौर पर संगठित अपराध और प्रशासनिक हताशा के साये में घिरा हुआ प्रतीत होता है। राजधानी रांची से लेकर सुदूर जिलों तक, अपराध का ग्राफ जिस तेजी से बढ़ा है, उसने आम नागरिक के मन में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।
राजधानी में असुरक्षा का माहौल और बंद होती दुकानें
किसी भी राज्य की प्रगति का पैमाना उसकी राजधानी की चहल-पहल और सुरक्षित रातों से मापा जाता है। परंतु झारखंड की राजधानी की स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। चर्चा है कि शहर की छोटी-बड़ी दुकानें रात आठ बजते ही डर के मारे बंद होने लगती हैं। यह डर किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि उन अपराधियों का है जो बेखौफ होकर लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। जब व्यापारिक प्रतिष्ठान सूरज ढलते ही बंद होने लगें, तो यह सीधे तौर पर पुलिस के इकबाल के खत्म होने का संकेत है। हत्या, अपहरण और जबरन वसूली जैसी घटनाएं अब दैनिक समाचारों का हिस्सा बन चुकी हैं। पेट्रोल पंपों पर डकैती और मॉल्स में सरेआम लूट इस बात का प्रमाण है कि अपराधियों के मन में कानून का कोई भय शेष नहीं रह गया है।
संगठित अपराध बनाम पुलिस की कार्यप्रणाली
अपराध दो प्रकार के होते हैं—एक रैंडम और दूसरा संगठित। माना जा सकता है कि रैंडम अपराधों को रोकना कभी-कभी कठिन होता है, लेकिन संगठित अपराध पूरी तरह से पुलिस की रडार पर होने चाहिए। झारखंड में ड्रग्स माफिया, ब्राउन शुगर का कारोबार, मानव तस्करी और जेलों से संचालित होने वाले आपराधिक गिरोहों का फलना-फूलना पुलिस की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल उठाता है। यह आरोप भी अक्सर लगते रहे हैं कि इनमें से कई अवैध धंधे पुलिस के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ जाए या मूकदर्शक बन जाए, तो जनता का विश्वास तंत्र से उठने लगता है। राज्य में अब अपराधियों का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि वे फर्जी पासपोर्ट के सहारे विदेश तक भागने में सफल हो रहे हैं, जो हमारी खुफिया एजेंसियों की विफलता को दर्शाता है।
प्रशासनिक नेतृत्व और हताशा का दौर
झारखंड पुलिस के शीर्ष नेतृत्व पर भी तीखे प्रहार किए गए हैं। विशेष रूप से डीजीपी की कार्यशैली को लेकर ‘हताशा’ शब्द का प्रयोग किया जाना प्रशासन की मानसिक स्थिति को दर्शाता है। जब पुलिस बल का मनोबल गिर जाता है और नेतृत्व केवल ‘रिटायरमेंट के बाद की बहाली’ या ‘कॉर्पोरेट हितों’ को साधने में लग जाता है, तो कानून-व्यवस्था का चरमराना निश्चित है। उदाहरण के तौर पर, जब एक निहत्थे बुजुर्ग का घर गिराने के लिए पुलिस बल पूरी मुस्तैदी और सायरन बजाते हुए पहुंचता है, लेकिन असली अपराधियों को पकड़ने में सुस्त नजर आता है, तो जनता के बीच पुलिस की छवि ‘सुपर कॉप’ की नहीं बल्कि एक ‘कमजोर तंत्र’ की बन जाती है।
झारखंड की वैश्विक छवि और अपराध का भूगोल
पिछले दो दशकों में झारखंड की छवि अपराध के विभिन्न केंद्रों के रूप में उभरी है। साइबर अपराध के मामले में जामताड़ा ने विश्व स्तर पर कुख्याति प्राप्त की है। वहीं, धनबाद का कोयला माफिया और वहां की गैंगवार पर आधारित फिल्में राज्य की नकारात्मक छवि को ही पुख्ता करती हैं। अपराध का केंद्र भी अब बदल रहा है; जो हत्याएं पहले गुमला जैसे इलाकों तक सीमित थीं, वे अब राज्य के मुख्य केंद्र रांची की सड़कों पर हो रही हैं। यह बदलाव इस बात का सूचक है कि अपराधियों ने अब सीधे सत्ता के केंद्र को अपनी गतिविधियों का अड्डा बना लिया है।
कॉर्पोरेट प्रभाव और सरकारी स्वायत्तता पर संकट
लोकतंत्र में सरकार एक स्वतंत्र और संप्रभु इकाई होती है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ‘स्पॉन्सर्ड स्वतंत्रता’ का खतरा मंडरा रहा है। यह आरोप कि सरकार उन लोगों की हो जाती है जो उसे स्पॉन्सर करते हैं, लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। झारखंड में ‘जल, जंगल, जमीन’ का नारा अब ‘जंगल राज’ में तब्दील होने के डर के रूप में देखा जा रहा है। उग्रवाद मुक्त होने के दावों के बीच उपद्रवियों का बढ़ता प्रभाव एक विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है। पुलिस विभाग द्वारा एक गिरोह को खत्म करने के लिए दूसरे गिरोह का सहारा लेना या सुपारी किलिंग जैसी प्रवृत्तियों में शामिल होना सुरक्षा तंत्र के नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
निष्कर्ष और सुरक्षा के बदलते मायने
पुलिस की नई गाड़ियों पर लिखा स्लोगन ‘आपकी सुरक्षा, हमारी जिम्मेदारी’ अब व्यंग्य बनकर रह गया है। सवाल यह है कि इस वाक्य में ‘आप’ शब्द का तात्पर्य आम नागरिक से है या सत्ता के गलियारों में बैठे प्रभावशाली लोगों से। यदि यह नागरिक सुरक्षा होती, तो प्रदेश की सड़कों पर रात को भी लोग निडर होकर चल रहे होते। पुलिस हेल्प लाइन नंबरों की निष्क्रियता और सहायता के लिए लगाई जाने वाली गुहारों का अनसुना होना यह बताता है कि तंत्र में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। झारखंड की जनता आज केवल आश्वासन नहीं, बल्कि एक ऐसी सुरक्षित व्यवस्था चाहती है जहां कानून का राज हो, न कि अपराधियों का आतंक।