दोपहिया वाहन चालक हर दिन जोखिम में, मिट्टी से पाटे गड्ढे बने खतरे का
ब्यूरो चीफ -राकेश मित्र जिला-कांकेर
लोक निर्माण विभाग (PWD) की घोर लापरवाही ने स्टेट हाइवे क्रमांक 25 को मौत का रास्ता बना दिया है। सड़क पर जगह-जगह इतने विशाल गड्ढे हैं कि हर दिन कोई न कोई वाहन चालक दुर्घटना का शिकार हो रहा है। हालत यह है कि यह हाइवे अब “हादसे का हाइवे” बन चुका है।
स्थानीय नागरिकों में आक्रोश:कापसी निवासी सौमित्र दे और राजेश हीरा , प्रकाश साना , विप्लव हालदार ने बताया कि विभाग को कई बार मौखिक शिकायत दी गई लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला काम आज तक नहीं हुआ। बरसात के मौसम में ये गड्ढे पानी से भर जाते हैं, जिससे वे दिखाई नहीं देते और दोपहिया वाहन सीधे इनमें समा जाते हैं। इससे कई वाहन चालक गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। *केवटी से इरपनार स्टेट हाइवे 25 में दुर्गकोंदल, कोड़े, बड़गांव , दोरदे, कापसी मार्ग पर चलना दूभर हो गया है सबसे ज्यादा खामियाजा मरीजों को उठाना पड़ रहा है आपात स्थिति में मरीजो को बेहतर इलाज के लिए रायपुर धमतरी रेफर किए जाते है । एंबुलेंस को केवल भानुप्रतापपुर 70 किमी पहुंचने में ही 2.30 घंटे से भी ज्यादा समय लग रहा है जिसके वजह से सीरियस मरीज रास्ते में ही दम तोड़ रहे है*नया पारा बना ‘दुर्घटना जोन*कापसी से पखांजूर के बीच नयापारा में पंकज शील के दुकान के सामने सड़क की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। विभाग ने यहां बड़े-बड़े गड्ढों को मिट्टी डालकर पाटने की कोशिश की है, लेकिन यह समाधान अब खुद एक गंभीर समस्या बन चुका है। मिट्टी सड़क पर फैलकर फिसलन पैदा कर रही है, जिससे स्कूटी और बाइक चालकों का संतुलन बिगड़ रहा है।*महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित*#स्कूली बच्चियां और महिला स्कूटी चालक इस मार्ग पर सबसे ज्यादा खतरे में हैं। कई बार हादसे हो चुके हैं, लेकिन विभाग पूरी तरह मौन है। ऐसा प्रतीत होता है कि पीडब्ल्यूडी के अधिकारी केवल एयर-कंडीशनर कार्यालयों में बैठकर कागज़ों पर हस्ताक्षर करने तक ही अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं।*जनता के मन में सवाल – बजट गया कहाँ?अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विभाग को इस सड़क की जर्जर हालत की जानकारी नहीं है, या जानबूझकर इसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है? क्या मरम्मत के नाम पर बजट जारी हुआ और वह कहीं और खप गया? जवाब देने वाला कोई नहीं।*नजरअंदाज कर फोन नहीं उठा रहे अधिकारी*#पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों और इंजीनियरों से दो दिनों तक लगातार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने फोन तक रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। इससे विभागीय उदासीनता और गैर-जवाबदेही स्पष्ट हो जाती है।