ये खून इश्क का था या इज़्ज़त का? आखिरकार इसके जिम्मेदार कौन
इंडियन टीवी न्यूज़ से संवाददाता सुपौल बिहार
बिहार में आए दिन मर्डर जैसी वारदातें होती रहती है लेकिन यह कुछ हटके मर्डर है
एक बाप अपनी बेटी को गोद में उठाकर स्कूल छोड़ता है। उसके लिए चप्पल से लेकर किताब तक, छांव से लेकर छत तक सब बनता है। अपनी थाली से निवाला निकालकर बेटी की थाली में रखता है, खुद भूखा रहकर उसके अरमानों को पालता है। ये वही पिता होते हैं जो छत पर चढ़कर पानी की टंकी ठीक करते हैं, पर बेटी की शादी के नाम पर दिल बैठ जाता है। मां-बाप बच्चों को पालते नहीं हैं, वो अपने दिल का टुकड़ा सींचते हैं। सालों की मेहनत, त्याग, सपने और विश्वास, जब एक बच्चे में बंधे होते हैं तो उनकी ज़िंदगी उसी बच्चे की ज़िंदगी से जुड़ जाती है।
लेकिन जब वही बच्चा बिना बताए अपनी राह चुन ले, किसी से प्रेम कर बैठे, और अपने मन की कर ले तो मां-बाप के भीतर कुछ चटक जाता है। जिस समाज के बीच वो रहते हैं, वहीं समाज उन्हें घूरने लगता है। कोई कहता है, बेटी भाग गई, कोई कहता है, नाम डुबा दिया, कोई हंसता है, कोई ताना मारता है। घर का दरवाज़ा बंद हो जाता है, पर समाज का मुंह नहीं। और फिर धीरे-धीरे एक बाप टूटता है, गिरता है, और कभी-कभी तो ऐसा कदम उठा लेता है जिसकी भरपाई उम्रभर नहीं हो सकती।
आज जो हुआ, वो सिर्फ एक हत्या नहीं थी। एक लड़का मारा गया, जो किसी का बेटा था, जिसने बस किसी से मोहब्बत की थी। एक बेटी की मांग सूनी हो गई, जिसे शायद दुनिया की नजरों से छुपकर जीना पड़ेगा। और एक बाप जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया, जिसकी उम्र अब सड़कों पर नहीं, अदालतों और जेलों में बीतेगी।
गलती किसकी थी? क्या उस लड़के की, जिसने प्रेम किया? क्या उस लड़की की, जिसने अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुना? या उस पिता की, जिसने एक दिन समाज के डर में वो कर डाला जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था?
शायद सबसे बड़ी गलती समाज की थी। इस समाज ने ही उस बाप को हर रोज़ जहर पिलाया। उसे यह महसूस कराया कि अब वो बाप नहीं रहा, अब वो मरा हुआ आदमी है। उसे ताने दिए, उसकी नींद छीन ली, और उसकी बेटी को ‘इज्जत की दलदल’ में घसीट दिया। यह वही समाज है जो टीवी पर रोमांस देखता है, फिल्मों में प्रेम गीत गाता है, पर अपने ही गांव के लड़के-लड़की को साथ देखकर आगबबूला हो जाता है।
प्रेम करना गुनाह नहीं है, लेकिन हमारे समाज में यह अब भी सज़ा के काबिल माना जाता है। और जब कोई लड़की अपने दिल की सुनती है, तो सबसे पहले उसका बाप शर्मिंदा किया जाता है। जब बाप शर्मिंदा होता है, तो मां-बाप के अरमान शर्मसार हो जाते हैं। और जब अरमान जलते हैं, तो कई बार इंसान पागलपन की हद तक चला जाता है।
हां, वह पिता गलत था। उसने हत्या की। लेकिन वह अपराधी नहीं था, वह मजबूर था। वह समाज की उस घुटन का शिकार था जो इज्जत के नाम पर इंसानों को भेड़िया बना देती है। आज वह पिता सलाखों के पीछे है, और शायद ताउम्र पछतावे में जलेगा। पर क्या समाज अब भी वहीं खड़ा रहेगा, दूसरों के बच्चों को देखकर ताना मारते हुए?
इस घटना ने एक लड़के को मार डाला, एक लड़की को बेसहारा कर दिया, और एक बाप को अपराधी बना दिया। अगर कोई ज़िंदा बचा है, तो सिर्फ यह जहरीला समाज, जो कल फिर किसी के सपनों को लील जाएगा।
प्रेम को अपराध बनाना बंद करें। मां-बाप के अरमानों को सम्मान दें, लेकिन बच्चों के अधिकारों को भी कुचलना बंद करें। नहीं तो फिर यही होगा एक बाप फिर टूटेगा, एक बेटा फिर मरेगा, एक बेटी फिर रोएगी, और समाज बस मजा लेते रहेगा।