एक बार फिर सहारनपुर की व्यथा
में सहारनपुर फिर से लहूलुहान हालत में अपना दर्द बयां करने से डर रहा हूं, कहने को तो कई सरपरस्त है मेरे परन्तु क्या करूँ इन सरपरस्तों का आपस मे लड़कर मेरा ही दोहन कर डाला, मेरे *घावो पर मलहम की बजाय अब नमक लगाने की प्रक्रिया जारी है
हा मैं अभागा सहारनपुर बोल रहा हूं
आंखे खोलता हूं तो सड़ी हुई नालियां, जगह जगह जलभराव, गंदगी के ढेर, टूटी सड़के, टूटी नालियां, मेरी छाती के रिसते जख्मो के बीच टूट गए मेरे अरमान परन्तु फिर भी मेरा सहारनपुर महान
हा मैं सहारनपुर ही आपसे मुखातिब हूं
मेरे फटे हुए दामन में कितने छेद हो चले है कोई उनसे पूछे जो गरीब है, सताए हुए है, ओर अपनी जीविका के लिए संघर्ष करते नज़र आते है, परन्तु मेरी असहाय अवस्था को आपसी लड़ाई में मानो मेरी आत्मा तक को झंझोड़ कर रख दिया।
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं
कौन कहेगा मेरे हृदय का हाल, कौन सुनेगा मेरी तकलीफ, कौन है जो अब दो घड़ी मेरी सुध लेकर मुझे तसल्ली दे, अब तो यह हाल है निगम मस्त, जनता त्रस्त ओर मैं यानी सहारनपुर पस्त की अवस्था से गुज़र रहा हूं।
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं
मेरे बेदम हो चले शरीर को अब कुछ लोग नोच नोच कर खा रहे है, कुछ उस नोचे गए शरीर को बैठकों की आड़ में मरहम लगाने की बात कर रहे है, दूर तक नज़र जाती है तो सिवाय लहू ओर घाव के कुछ नज़र नही आता, मेरे घावों पर पैर रखकर कोई अमीर से बहुत अमीर हुआ, लेकिन गरीब और गरीब हुआ, परन्तु मेरा क्या? मैं तो वही पड़ा हूं बरसो से इस उम्मीद के साथ कि कोई मेरा भी वली वारिस आएगा और मुझे पुनर्निर्माण के रूप में संजीवनी देगा, परन्तु लगता है अब किसी से आस नही, निष्ठुरता की सभी हदे पार हो चुकी है, फिर भी उम्मीद के साथ घिसट रहा हूं।
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं
अब धीरे धीरे कराहने के अलावा में कर क्या सकता हूं, केवल बंदरबांट होते देखने के अलावा मेरा कोई स्थान ही नही है, मेरे सामने होने वाली लूट खसोट ओर बर्बादी क्या गुल खिलाएगी, अब निगम की राजनिति क्या धनलोलुपता में लुप्त हो जाएगी।
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं और देख रहा हूं।
अपने उन पुराने दिनों को हस्तिनापुर की कुर्सी से बंधे भीष्मपितामह की तरह बाणों की शैय्या की मानिंद अपने रिसते घावों के साथ इस उम्मीद में की कोई अर्जुन आएगा एक तीर मरेगा ओर धरती का सीना चीर कर मेरी अन्तरात्मा की प्यास बुझायेगा, परन्तु स्वप्न से लगता है, की क्या ऐसा होगा? जब मरणावस्था से ऊपर उठ कर में स्वयं चलने लग जाउंगा?* स्वयं *अपनी पीड़ा का हरण होते देखूंगा? न जाने वो दिन कब आएगा?
हा में सहारनपुर बोल रहा हूं
कितनी राजनीति करोगे मुझ पर, कोई विधायकी चाहता है, कोई निगम की सत्ता, कोई नेता दल, कोई दल बदल, कोई ठेकेदारों की सरदारी, कोई अपना वर्चस्व दिखाता है,कोई व्यपारियो को डराता है, कोई जनता को डराता है, कोई आर्थिक लूट में शामिल है, कोई फ़र्ज़ी आंकड़ो में व्यस्त है,परन्तु लगता है सहारनपुर की सारा सिस्टम ही ध्वस्त है।आखिर छोड़ क्यो नही देते मेरे दामन को ओर कर दे किसी ऐसे व्यक्ति के हवाले जो मेरे अस्तित्व के साथ मेरी व्यथा को समझे, मेरी परेशानियों को समझे, कुछ दूर मेरे साथ चले और कहे कि मैं हूं ना?
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं
मेरी सुंदरता पर श्रृंगार करते करते *मेरे माथे पर असंख्य घाव लगा दिए, एक चोक पर लगे शेर के पत्थर तक उखाड़ दिए, मेरा सहारनपुर के जगह जगह लगे बोर्ड की बत्तियां गुल हो गयी, बाज़ारो की सड़कें ओर नालियां गायब हो गयी, टैक्स की मार से मेरा हर गली, हर मोहल्ला हलकान है परन्तु मेरे सरपरस्त होने के दावों के बीच ऐसे लोग महान है जिन्होंने अब अपनी मर्यादाये छोड़ दी, अपनी सभी सीमाएं तोड़ दी, अपनी सभी संवेदनाएं मारते हुए अपनी सहारनपुर के प्रति अपनी आस्थाओं तक का त्याग कर डाला, फिर भी मैं तो सहारनपुर हूं यही पड़ा रहूंगा, इस उम्मीद के साथ कि अगला चुनाव आएगा, फिर से मुझे सँवारा जाएगा, फिर से मेरे जख्मो पर मरहम लगाकर कुछ नए वादे होंगे और फिर नए लोग आकर मेरा सामूहिक बलात्कार करेंगे, वही वर्षो पुरानी पीड़ा की कहानी मेरे साथ फिर दोहराई जाएगी, खैर जिंदा रहने की उम्मीद में मुझे फिर एक बार विश्वास करना होगा, लेकिन इस बार मेरी गुजारिश होगी कि ऐसे बलात्कारियों को सजा जरूर मिले जिनमे संवेदनाये, मानवता ओर जनता के प्रति कार्य करने और विकास करने की चाह न हो।
हा मैं सहारनपुर बोल रहा हूं, देख भी रहा हूं, सुन भी रहा हूं, समझ भी रहा हूं, बस कुछ कर नही पा रहा हूँ।
आलोक अग्रवाल
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़