सलेहा में विराजमान परम पूज्या श्रमणी ज्ञानमूर्ति गणिनी आर्यिका गुरु माँ 105 विन्ध्य श्री माता जी ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन अनेकांतवादी है। जैन दर्शन आचरण का प्रतीक होता है। जैन दर्शन में आचरण पूज्य होता है। जैन दर्शन में व्यक्ति की नहीं बल्कि उसके आचरण की पूजा होती है। और जब तक हमारे आचरण में नहीं होगा, तब तक हमारा उत्थान नहीं होगा।
एक बार जब गुरु माँ ने कहा- मुझे याद आता है वह प्रसंग राम, लक्ष्मण और सीता वन में जा रहे थे। तभी राम और सीता में संवाद शुरु हो गया कि किसके चरण सुन्दर? याद रखना, जहाँ विवाद होता है वहाँ दोनों की हार होती है और जहाँ संवाद होता है, वहाँ दोनों की जीत होती है। राम और सीता के बीच में चल रहे संवाद को लक्ष्मण खड़े-खड़े सुन रहे थे। पर दोनों के बीच में बोलना उचित नहीं समझते थे, क्योंकि बड़ों के बीच में छोटों का बोलना उचित नहीं होता है।
जब दोनों का संवाद खत्म नहीं हो रहा था, तभी दोनों ने आपस में कहा- कि लक्ष्मण को बुलाकर पूछते हैं कि किसके चरण सुंदर हैं? लक्ष्मण को बुलाया
और कहा – लक्ष्मण, तुम बताओ कि सीता के चरण सुंदर हैं या मेरे चरण सुंदर हैं। तब लक्ष्मण मन ही मन विचार करने लगे, कि किसके चरण सुंदर कहूँ। अगर भाभी के कहूँगा तो भाई को बुरा लगेगा और भाई के कहूँगा, तो भाभी को बुरा लगेगा। पर, निर्णय तो लेना ही था। तब लक्ष्मण ने कहा- भैया, चरन तो
भाभी के सुंदर हैं। सीता फूली नहीं समाई। तभी लक्ष्मण ने कहा- भाभी, हँसने वाली बात नहीं है। आपके चरण इसलिए सुंदर हैं, क्योंकि आप भैया के पग चिन्हों पर चलती है। राम खुश हो गए, उनको लगा कि मेरे चरण सुंदर हैं। तब लक्ष्मण ने कहा – भैया, आपके चरण इसलिए सुंदर हैं, क्योंकि आपका आचरण पूज्य होता है। सुंदर है। इसीलिए कहा गया है कि – जैन दर्शन में चरण नहीं, आचरण पूज्य होता हैं ।