प्रस्तुत है एक लेख जो हकीकत से रूबरू कराएगा..
क्या सचमुच रावण मर गया? विजयदशमी पर उठता बड़ा सवाल
पूरे देश में इस वर्ष भी विजयदशमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। बुधवार रात रावण वध के साथ जगह-जगह रामलीलाओं का समापन हुआ और गुरुवार को रावण के विशालकाय पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक पर्व पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया।
हजारों-लाखों की भीड़ इस आयोजन की गवाह बनी। आसमान आतिशबाज़ी से रोशन हुआ, जय-जयकार के नारे गूंजे और हर ओर विजय की खुशी दिखाई दी।
*लेकिन, इन उत्सवों और आयोजनों के बीच एक सवाल अनकहा रह जाता है, क्या सचमुच रावण मर गया? क्या केवल पुतले को जलाने से रावण का अंत हो जाता है, या फिर समाज के भीतर छिपे ‘जीवित रावण’ अभी भी सांस ले रहे हैं?*
पौराणिक कथाओं में रावण अहंकार, अन्याय, लोभ और अधर्म का प्रतीक माना जाता है। पर आज का सच यह है कि यही रावण अलग-अलग रूपों में हमारे समाज में बार-बार सिर उठाता है। कहीं भ्रष्टाचार के रूप में, कहीं साम्प्रदायिक नफरत के रूप में, कहीं जातीय विभाजन और महिलाओं पर अत्याचार के रूप में और कहीं सत्ता की ताक़त का दुरुपयोग कर आम जनता को दबाने के रूप में, विजयदशमी हमें आत्ममंथन का अवसर देती है कि क्या हमने इन बुराइयों को खत्म किया या सिर्फ एक पुतला जलाकर संतुष्ट हो गए?
सोशल मीडिया का नया ‘लंकेश’
आज सोशल मीडिया के दौर में एक नया ‘रावण’ जन्म ले चुका है। यह रावण लोगों की सोच को बांटता है, समाज को धर्म और मज़हब के नाम पर लड़ाता है और भाईचारे की नींव को खोखला करता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि देश की लगभग 3% आबादी हर समय केवल हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों पर जहर उगलती रहती है। यह वर्ग इतना मुखर है कि अक्सर सही मुद्दों, जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और किसानों की समस्याएं पीछे छूट जाते हैं। और दुख की बात यह है कि इस वर्ग को न सिर्फ सोशल मीडिया पर बढ़ावा मिलता है बल्कि राजनीतिक समर्थन भी हासिल रहता है।
असली विजयदशमी की ज़रूरत
सवाल यह नहीं कि हम हर साल रावण का पुतला क्यों जलाते हैं। सवाल यह है कि हम समाज के भीतर पल रहे असली रावण को कैसे खत्म करेंगे।
अगर अहंकार, नफरत और अन्याय के पुतले हमारे दिल और दिमाग में जलते ही नहीं, तो असली विजयदशमी कभी पूरी नहीं होगी। आज हमें अपने भीतर झांककर यह देखना होगा कि हम किस तरह के रावण को पोषित कर रहे हैं और क्या सचमुच उससे लड़ने के लिए तैयार हैं।
विजयदशमी सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन भी है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि बुराई पर अच्छाई की जीत तभी होगी जब हम सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन के हर स्तर पर रावण को पहचानें और उसका वास्तविक वध करें। वरना हर साल रावण का पुतला जलता रहेगा, लेकिन रावण हमारे बीच जीवित ही रहेगा।
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़