समाचारों का आईना भरतसिंह राजपुरोहित अगवरी
आहोर कहते हैं कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, लेकिन आहोर के खेतेश्वर कॉलोनी निवासी बुजुर्ग टीकम सिंह राजपुरोहित (70) की हत्या के मामले में यह कहावत आज मज़ाक बनती नजर आ रही है। 10 दिसंबर 2020 को हुई इस जघन्य हत्या को अब पूरे 5 साल बीत चुके हैं, मगर आहोर पुलिस आज तक न तो हत्यारों तक पहुंच पाई है और न ही पीड़ित परिवार को न्याय की कोई ठोस उम्मीद दिखा पाई है।
हत्या के बाद अपराधियों ने शव को भागली पुरोहितान की सरहद पर फेंक दिया था, जिससे साफ जाहिर होता है कि वारदात पूरी योजना के साथ अंजाम दी गई थी। इस घटना को लेकर मृतक के पुत्र गोपाल सिंह राजपुरोहित ने उसी समय आहोर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई थी। शुरुआती दौर में पुलिस ने जल्द खुलासे के दावे किए, जांच के बड़े-बड़े वादे किए गए, लेकिन वक्त के साथ ये सारे दावे सिर्फ कागज़ी साबित होते चले गए।
चार साल नहीं, अब पांच साल गुजर चुके हैं, लेकिन आज तक न किसी आरोपी की गिरफ्तारी हुई और न ही किसी ठोस नतीजे तक जांच पहुंची है। पुलिस ने जांच के नाम पर परिवार के सदस्यों के मोबाइल जब्त किए, कॉल डिटेल खंगालने की बात कही गई, मगर न तो कोई ठोस खुलासा नहीं जब भी पीड़ित परिवार थाने के चक्कर लगाता है, हर बार एक ही रटा-रटाया जवाब सुनने को मिलता है—“कार्रवाई चल रही है।” सवाल यह है कि आखिर यह कार्रवाई कब पूरी होगी? और क्या कार्रवाई का मतलब सिर्फ फाइलों का बोझ बढ़ाना ही रह गया है?
यह मामला अब सिर्फ एक हत्या का नहीं रहा, बल्कि यह पुलिस जांच की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका है। राजपुरोहित समाज ही नहीं, बल्कि 36 कौम के लोगों में इस मामले को लेकर भारी आक्रोश है। आहोर विधायक ने दो बार विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया, मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की गई, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कोई बड़ा बदलाव नजर नहीं आया।
न्याय की आस में पीड़ित परिवार को हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाना पड़ा। व 10 दिन में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि अदालत के आदेश के बाद भी जांच की रफ्तार में कोई खास तेजी नहीं आई। कार्रवाई आज भी कछुआ चाल से ही आगे बढ़ती दिखाई दे रही है।
मामले की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि मृतक की पत्नी और बेटी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री और डीजीपी को पत्र लिखकर इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग तक कर डाली। लेकिन इसके बावजूद स्थिति “ढाक के तीन पात” जैसी ही बनी हुई है। जिले के लगभग हर अधिकारी को इस केस की जानकारी है, मगर जवाब सबके पास एक ही है—“कार्रवाई चल रही है।” यह जवाब अब पीड़ित परिवार के लिए जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा बन चुका है।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि न्याय की राह देखते-देखते परिवार ने एक और अपना खो दिया। मृतक की पत्नी का भी इंतजार करते-करते निधन हो गया। यानी इंसाफ की आस में एक मां की आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं, लेकिन हत्यारे आज भी कानून की पकड़ से बाहर हैं। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के मुंह पर तमाचा है।
आज बड़ा सवाल यह है कि क्या गरीब और साधारण परिवारों को न्याय पाने का अधिकार नहीं? क्या उनकी लड़ाई सिर्फ फाइलों और तारीखों में ही दफन होकर रह जाएगी? अगर पांच साल में भी एक बुजुर्ग की हत्या के आरोपी नहीं पकड़े जा सकते, तो आम आदमी का कानून और पुलिस व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?
इनका कहना
“पांच साल से दर-दर भटक रहे हैं। न्याय तो नहीं मिला, उल्टा न्याय के इंतजार में मेरी मां का भी निधन हो गया। आखिर मेरे पिताजी के हत्यारों की गिरफ्तारी कब होगी?”
खुशबु राजपुरोहित, मृतक की पुत्री, यह मामला अब सिर्फ एक हत्या की जांच का नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही का इम्तिहान बन चुका है। अगर अब भी ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल हमेशा हवा में तैरता रहेगा—क्या हमारे सिस्टम में सच में इंसाफ नाम की कोई चीज़ बची है?
SP Jalore Lumbaram Choudhary