12 दिन पहले 12 फरवरी को लापता हुए 14 साल के मासूम गिरीश का क्षत-विक्षत शव पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, गांव में मातम और सनसनी है। आखिर कब तक हमारे बच्चे सुरक्षित नहीं होंगे? क्या 12 दिन का समय एक किशोर को ढूंढने के लिए काफी नहीं था?
पुलिस अब पोस्टमार्टम और जांच की बात कर रही है, लेकिन उस सूनी गोद का क्या जिसे अब कभी भरा नहीं जा सकता?
सहसवान कोतवाली क्षेत्र के रसूलपुर बेला गांव से 12 फरवरी को लापता हुए 14 वर्षीय गिरीश का आज क्षत-विक्षत शव मिला है।
सवाल यह है: 12 दिनों तक पुलिस क्या कर रही थी?
सवाल यह है: क्या ‘प्राथमिकी दर्ज’ कर लेना ही पुलिस की जिम्मेदारी की इतिश्री है?
12 दिन तक एक मां-बाप अपनी आंखों के तारे के सुरक्षित लौटने की दुआ मांगते रहे, और आज उन्हें मिली तो सिर्फ अपने कलेजे के टुकड़े की लाश। जब शव खेत में पड़ा मिला, तब जाकर तंत्र जागा है। अगर पुलिस ने तलाश में सक्रियता दिखाई होती, तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती।
प्रशासन से मांग है कि इस जघन्य कृत्य के दोषियों को पाताल से भी ढूंढ निकाला जाए। परिवार को न्याय चाहिए, कोरे आश्वासन नहीं!
इंडियन टीवी न्यूज रिपोर्टर जिला बदायूं दीपेन्द्र राजपूत