कौशिक नाग- कोलकाता
पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल (गुरुवार) को होने वाले प्रथम चरण के चुनाव से पहले शहर में सार्वजनिक परिवहन पर असर साफ दिखाई देने लगा है. सड़कों से गाड़ियां गायब हो रही हैं. कोलकाता की सड़कों पर निजी सार्वजनिक वाहनों की संख्या 50 प्रतिशत से भी कम रह गयीं हैं. चुनावी तैयारियों के बीच कोलकाता में बसों की कमी से आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. प्रशासन ने चुनाव कार्यों के लिए सोमवार से ही बड़े पैमाने पर सरकारी और निजी बसों को सड़कों से हटाकर अपने नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया है. जानकारी के अनुसार, सोमवार को ही करीब 50 प्रतिशत बसों को यात्री सेवा से हटा लिया गया. इन बसों का उपयोग केंद्रीय अर्धसैनिक बल (सीएपीएफ) और पुलिस कर्मियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में किया जायेगा. बस यूनियनों के अनुसार, कोलकाता और आसपास के इलाकों में रोजाना लगभग तीन हजार निजी बसें चलती हैं. इनमें से करीब 1600 बसों को चुनावी ड्यूटी के लिए अधिग्रहित (रिक्विजिशन) किया गया है. प्रथम चरण के लिए 50 प्रतिशत बसें पहले ही ले ली गयी हैं, जबकि 25 और 27 अप्रैल को भी कुछ बसों को चुनावी कार्यों में लगाया जायेगा. यूनियन ने मांग की है कि चुना वी जरूरतों के बावजूद कम से कम 40 प्रतिशत बसों का संचालन जारी रखा जाए, ताकि शहर में आवागमन पूरी तरह बाधित न हो टी सबअर्बन बस सर्विस के महासचिव टिटू साहा ने निजी बसों के बड़े पैमाने पर उपयोग को लेकर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि दो चरणों में होने वाले चुनाव के कारण एक साथ सैकड़ों बसों को ड्यूटी में लगाया जा रहा है. सामान्य दिनों में शहर की बसें 140 से 200 किलोमीटर प्रतिदिन चलती हैं, लेकिन चुनावी ड्यूटी में इन्हें 500 से 600 किलोमीटर तक चलाना पड़ सकता है, जिससे बसों की स्थिति पर असर पड़ेगा. उन्होंने बताया कि इस संबंध में परिवहन विभाग के प्रधान सचिव को पहले ही पत्र भेजा जा चुका है.