राजेश कुमार तिवारी इंडियन टीवी न्यूज़
आज के दौर में फिल्में मोबाइल और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर एक क्लिक में उपलब्ध हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सिनेमा खुद गांव-गांव पहुंचता था। ट्रक पर लदा प्रोजेक्टर, बड़ा तंबू, फिल्म की रीलें और जनरेटर… यही था टूरिंग टॉकीज, जिसने लाखों लोगों को पहली बार बड़े पर्दे का रोमांच दिया। आइए देखते हैं एक खास रिपोर्ट।
टूरिंग टॉकीज भारतीय सिनेमा का वह सुनहरा अध्याय है, जिसने गांवों और कस्बों में मनोरंजन की नई दुनिया बसाई। जहां स्थायी सिनेमाघर नहीं थे, वहां ट्रकों में प्रोजेक्टर, तंबू और फिल्मी रीलें लेकर पहुंचने वाली टूरिंग टॉकीज लोगों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होती थी। 1970 और 80 के दशक में देशभर के साथ मध्य प्रदेश के कई जिलों में इसका खासा क्रेज था।
मेले, रामलीला, गणेश उत्सव और नवरात्र जैसे आयोजनों में टूरिंग टॉकीज सबसे बड़ा आकर्षण होती थी। तंबू के बाहर बड़े-बड़े पोस्टर, लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीत और टिकट खरीदने के लिए लगी लंबी कतारें उस दौर की पहचान थीं। लोग पैदल, साइकिल, बैलगाड़ी और बसों से पहुंचकर परिवार के साथ बड़े पर्दे पर अपनी पसंदीदा फिल्में देखते थे।
फिल्म के दौरान कभी रील टूट जाती, तो कभी जनरेटर बंद हो जाता, लेकिन दर्शकों का उत्साह कम नहीं होता था। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं घंटों तक फिल्म का आनंद लेते और पूरी रात सिनेमा के रंग में रंगे रहते। यही वजह थी कि टूरिंग टॉकीज केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप का भी बड़ा माध्यम बन गई थी।
समय बदला, टेलीविजन आया, फिर केबल नेटवर्क, डीवीडी और अब ओटीटी प्लेटफॉर्म ने मनोरंजन की दुनिया पूरी तरह बदल दी। इसके साथ ही टूरिंग टॉकीज का दौर धीरे-धीरे इतिहास बन गया। हालांकि आज भी इसकी यादें उन लोगों के दिलों में ताजा हैं, जिन्होंने खुले आसमान के नीचे तंबू में बैठकर बड़े पर्दे का जादू पहली बार महसूस किया था।
टूरिंग टॉकीज केवल फिल्म दिखाने का माध्यम नहीं थी, बल्कि गांवों की सामूहिक खुशियों, मेलों की रौनक और सिनेमा से जुड़े सुनहरे दौर की पहचान थी। तकनीक भले बदल गई हो, लेकिन टूरिंग टॉकीज की यादें आज भी लोगों के दिलों में उसी तरह जीवित हैं।