बदनावर। कण्व वन सेवा संस्थान, कानवन द्वारा कोटेश्वर महादेव धाम के आगे कोद-भैंसोला मार्ग स्थित शंकरपुरा की पहाड़ी पर रविवार को आयोजित बीजारोपण महाअभियान में सैकड़ों श्रमदानियों ने मात्र चार घंटे में करीब सात लाख बीजों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया।अभियान में कण्व वन सेवा संस्थान के साथ रुद्राक्ष सेवा समिति, टीबीएस फाउंडेशन, विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थी एवं शिक्षक, प्रस्फुटन समितियों के सदस्य तथा बड़ी संख्या में ग्रामीणजन गैंती, फावड़े और कुदाली लेकर शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से गैंती पूजन के साथ हुई। इसके बाद प्रातः आठ बजे से दोपहर 12 बजे तक प्रतिभागियों ने पर्यावरण संरक्षण के गीत और भजन गाते हुए पहाड़ी पर बीजारोपण किया मुख्य अतिथि पद्मश्री मोहन नागर ने वृक्षों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “एक पेड़ दस पुत्रों के समान होता है।” उन्होंने कहा कि वृक्ष हमें लकड़ी, छाया, औषधि, ऑक्सीजन तथा भूजल स्तर बढ़ाने जैसे अनेक अमूल्य लाभ प्रदान करते हैं। पेड़ लगाना सबसे बड़ा पुण्य है और पहाड़ियाँ हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं। वे वर्षा जल को संचित कर वर्षभर झरनों, नदियों और नालों के माध्यम से जीवनदायिनी जलधारा उपलब्ध कराती हैं। इसलिए पहाड़ियों का संरक्षण और हरियाली बढ़ाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति छोटा-सा योगदान भी दे, तो वही भविष्य में बड़े परिवर्तन का आधार बन सकता है। प्रकृति की रक्षा करना हम सभी का नैतिक दायित्व है और यही आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।
इस अवसर पर परिषद के संभाग समन्वयक अमित शाह, जिला समन्वयक सौरभ शुक्ला, विकासखंड समन्वयक सुशीला मेड़ा सहित अनेक पर्यावरण प्रेमी उपस्थित रहे। आयोजन के सूत्रधार कण्व वन सेवा संस्थान की पूरी टीम ने अभियान को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बीजारोपण के बाद आयोजित संवाद कार्यक्रम में पर्यावरण प्रेमियों से चर्चा की गई। संचालन गोविंद पंवार ने किया तथा आभार संस्था अध्यक्ष विक्रमसिंह सोलंकी ने माना।
महीनों की मेहनत के बाद तैयार होते बीज
संस्था के कार्यकर्ता महीनों पहले से फलदार एवं वन प्रजातियों के बीज एकत्र कर उनका उपचार करते हैं। वर्षा ऋतु में इन्हें टीम के कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के सहयोग से पहाड़ियों पर रोपित किया जाता है। बीजों से उगने वाले पौधों को प्रारंभिक वर्षा के बाद अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता कम होती है और वे धीरे-धीरे विकसित होकर वृक्ष का रूप ले लेते हैं। यह पद्धति कम लागत में बड़े पैमाने पर हरियाली बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रही है।