नई दिल्ली, 19/08: भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती वर्ष के अवसर पर गत 24 मई को नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला मैदान में आयोजित ‘जनजाति समागम 2026’ जनजातीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और अस्मिता का एक विशाल राष्ट्रीय समागम बन गया। देश के 500 से अधिक जनजातीय समुदायों के लाखों लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीत, लोकनृत्य, वाद्ययंत्र और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ इस आयोजन में भाग लिया।
दिल्ली के राजघाट चौक, रामलीला मैदान, अजमेरी गेट चौक, कुदसिया बाग और श्यामगिरी मंदिर सहित विभिन्न स्थानों से विशाल शोभायात्राएं निकाली गईं, जो लाल किला मैदान पहुंचीं। लेह-लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक के जनजातीय समाज ने पारंपरिक नृत्य, लोकधुन, मांदल और विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की जनजातीय विरासत का जीवंत प्रदर्शन किया।
समागम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की आस्था, संस्कृति, प्रकृति पूजा, जल-जंगल-जमीन और जीवन पद्धति भारत की सांस्कृतिक आत्मा से गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यह समागम जनजातीय समाज के ‘महाकुंभ’ के रूप में याद किया जाएगा।
वक्ताओं ने कहा कि जनजातीय समाज केवल प्रकृति का संरक्षक ही नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। सदियों से जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ प्रकृति एवं मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का मार्ग जनजातीय जीवनशैली ने दिखाया है। वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट का सामना कर रही है, ऐसे में जनजातीय जीवनदर्शन टिकाऊ विकास का प्रेरणादायक मॉडल बन सकता है।
इस अवसर पर जनजाति सुरक्षा मंच की ओर से कहा गया कि यह समागम केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि लंबे समय से जनजातीय समाज द्वारा उठाई जा रही एक न्यायसंगत मांग का राष्ट्रीय स्तर पर पुनः उद्घोष है। मंच के अनुसार, जनजातीय पहचान केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज, सामाजिक परंपराओं और सामुदायिक जीवन पद्धति से गहराई से जुड़ी हुई है।
मंच की ओर से यह भी मांग उठाई गई कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराओं को पूरी तरह त्याग करता है, तो उसकी अनुसूचित जनजाति की मान्यता तथा उससे जुड़े लाभों के संबंध में स्पष्ट कानूनी प्रावधान किया जाना चाहिए।
जनजाति सुरक्षा मंच के अनुसार, वर्ष 2009-10 में 26 राज्यों के 293 जिलों और 26,253 गांवों में व्यापक अभियान चलाकर वयस्क जनजातीय सदस्यों से लगभग 27.67 लाख हस्ताक्षर एकत्र किए गए थे। मंच का दावा है कि इन हस्ताक्षरों को जिलाधिकारियों और राज्यपालों के माध्यम से राष्ट्रपति के पास भेजा गया।
वर्ष 2011 से अब तक जनसंपर्क अभियान, रैलियों, सम्मेलनों और 21 राज्यों में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से अभियान जारी है। मंच ने प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड भेजने तथा करीब 450 सांसदों से सीधे संवाद करने का भी दावा किया है।
मंच के एक प्रतिनिधिमंडल ने 28 मई 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर जनजातीय कल्याण से जुड़े विभिन्न कानूनी और संवैधानिक मुद्दों को उठाया।
प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख मांगों में लोकुर समिति की सिफारिशों के अनुसार ‘अनुसूचित जनजाति’ की स्पष्ट कानूनी परिभाषा तय करना, संवैधानिक आदेश में आवश्यक संशोधन अथवा स्पष्टीकरण करना तथा जनजातीय समुदाय की सांस्कृतिक अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जैसे मुद्दे शामिल रहे।
मंच ने राष्ट्रपति से इन विषयों को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास भेजकर कानूनी रूप से परीक्षण कराने और आवश्यक सिफारिश करने का अनुरोध किया है।
मंच का कहना है कि यह केवल आरक्षण या कानूनी व्याख्या का विषय नहीं है, बल्कि करोड़ों जनजातीय लोगों की सांस्कृतिक अस्मिता, परंपरा और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए लंबे समय से चली आ रही इन मांगों पर जल्द और सकारात्मक निर्णय लिया जाना आवश्यक है।
जनजाति समागम 2026 का समापन जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, पारंपरिक आस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने के राष्ट्रीय आह्वान के साथ हुआ।
मयूरभंज से हिमांशु शेखर प्रहराज।