न्याय के सबसे बड़े मंदिर में आधी-अधूरी और भ्रामक जानकारी देकर मनमुताबिक आदेश हासिल करने वालों को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने जोरदार झटका दिया है। एक ऐसे मामले में, जो करीब 9 महीने पहले ही संभागायुक्त के स्तर पर पूरी तरह निपट चुका था, याचिकाकर्ता और वकीलों ने हाईकोर्ट को यह झांसा दे दिया कि ‘प्रकरण अभी भी पेंडिंग है’। इस धोखे के चलते कोर्ट ने कमिश्नर को 30 दिन के भीतर फैसला करने का फरमान भी सुना दिया। लेकिन जब राज्य सरकार की रिव्यू याचिका में सच्चाई सामने आई, तो अदालत ने न सिर्फ अपना आदेश वापस खींच लिया, बल्कि सरकारी व निजी दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं को आईना दिखाते हुए कड़ी हिदायत जारी कर दी।
पूरा खेल क्या था? (कैसे हुई अदालत से चूक?)
राजस्व विवाद से जुड़े इस मामले में हाईकोर्ट ने 6 मई को एक आदेश जारी किया। इसमें बिलासपुर संभाग के कमिश्नर को निर्देश दिया गया था कि राजस्व अपील का लंबित मामला 30 दिन के भीतर निपटाया जाए।
हैरानी की बात यह रही कि यह आदेश जिस मामले पर दिया गया, उसका निपटारा कमिश्नर कोर्ट द्वारा 6 अगस्त 2025 को ही किया जा चुका था! यानी जो फैसला 9 महीने पहले कागजों और ऑनलाइन रिकॉर्ड पर दर्ज था, उसे अदालत के सामने जानबूझकर या लापरवाही से ‘लंबित’ बनाकर पेश किया गया।
शासन की रिव्यू पिटीशन से फूटा भंडाफोड़
जब कमिश्नर कार्यालय तक आदेश पहुंचा, तब विभाग के होश उड़े। शासकीय अधिवक्ता सब्यसाची चौबे के जरिए राज्य शासन ने तत्काल पुनर्विचार (Review) याचिका दायर की। कोर्ट को आईना दिखाते हुए बताया गया कि:
याचिकाकर्ता ने बेहद अहम तथ्य कोर्ट से छिपाए।
जो फैसला पहले ही हो चुका था, उस पर ऐसा आदेश ले लिया गया जिसका पालन करना कानूनी तौर पर नामुमकिन था।
राज्य सरकार ने कोर्ट के 6 मई के आदेश के विवादित पैराग्राफ (8, 9 और 10) को हटाने की मांग की।
जस्टिस ए.के. श्रीवास्तव का कड़ा रुख: आदेश बदला, वकीलों को चेताया
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ए.के. श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने रिकॉर्ड खंगाले। कोर्ट ने माना कि उससे भारी तथ्यात्मक चूक हुई है, क्योंकि दोनों ही पक्षों के वकीलों ने सच कोर्ट के सामने नहीं रखा था।
अदालत ने तत्काल प्रभाव से पुराने आदेश के पैराग्राफ 8, 9 और 10 को विलोपित (हटा) कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया कि यदि पक्षकार कमिश्नर के मूल आदेश (6 अगस्त 2025) से असंतुष्ट हैं, तो वे कानूनन उसे उचित मंच पर चुनौती देने के लिए स्वतंत्र हैं।
> हाईकोर्ट का सख्त संदेश: “अदालत तमाशा नहीं, सतर्क रहें वकील”
> कोर्ट ने अधिवक्ताओं की ढिलाई और चालाकी पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
> “राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता सुनवाई के दौरान पूरी सतर्कता बरतें। कोर्ट के समक्ष केवल और केवल वास्तविक तथ्य रखें। अदालत के सामने दिया गया एक भी गलत बयान प्रशासनिक मशीनरी और संबंधित प्राधिकारियों के बीच भारी भ्रम पैदा करता है।”
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बड़ा सवाल: क्या यह महज वकीलों की भूल थी या सुनियोजित चाल?
कानूनी गलियारों में अब यह चर्चा गर्म है कि क्या ऑनलाइन रिकॉर्ड होने के बावजूद कमिश्नर का आदेश छिपाना सिर्फ एक ‘लापरवाही’ थी, या फिर किसी पुराने फैसले को रद्द करवाने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत कोर्ट को गुमराह किया गया था? हाईकोर्ट के इस कड़े रुख ने साफ कर दिया है कि अब फाइलों में सच छिपाकर राहत पाने की वकालत बिलासपुर हाईकोर्ट में कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
अभिषेक कुमार पाण्डेय रिपोर्टर बिलासपुर छत्तीसगढ़