बिलासपुर (ग्राउंड ज़ीरो से झकझोरती रिपोर्ट)।
कलम की ताकत, कानून की गरिमा और न्याय की ऊंची-ऊंची दीवारों के ठीक सामने गुरुवार को जो कुछ हुआ, उसने पूरे सिस्टम की इंसानियत और सामाजिक सुरक्षा के हर दावे को तार-तार कर दिया। जिस शख्स ने अपनी जिंदगी के 50 अनमोल साल वकीलों के चैंबर, मुकदमों की तारीखों, फाइलों के बस्तों और हाईकोर्ट की गलियों को सींचने में खपा दिए—वही 74 वर्षीय बुजुर्ग मुंशी दीपक दास मानिकपुरी उसी अदालत के मुख्य द्वार के सामने एक बेलगाम माजदा के पहियों तले बेरहमी से कुचल दिए गए।
यह महज एक साधारण सड़क हादसा नहीं है; यह उस खोखली व्यवस्था का नंगा सच है, जहाँ 50 साल तक इंसाफ की इबारत लिखने में पर्दे के पीछे रहने वाला अदना सा मजदूर आधी सदी बाद भी अपनी मुफलिसी नहीं बदल सका। साइकिल से शुरू हुआ सफर टूटी बाइक पर ही खत्म हो गया, और अंत में नसीब हुआ तो बस सड़क पर बिखरा अपना ही लहू और सिम्स मरच्यूरी की ठंडी मेज!
आधी सदी की सेवा का यह सिला? न पेंशन, न सुरक्षा, न सम्मान!
सोचिए, जिस हाईकोर्ट में अरबों-करोड़ों के दावों पर बहस होती है, उस परिसर की रीढ़ कहे जाने वाले मुंशी की क्या हैसियत है?
50 साल की निष्ठा: दीपक दास ने अपनी आधी उम्र से ज्यादा वक्त अधिवक्ताओं और पक्षकारों के बीच पुल बनकर गुजारा। कभी बारिश में, कभी तपती धूप में, सिर्फ इसलिए दौड़ते रहे कि किसी गरीब की जमानत न रुक जाए, किसी की याचिका खारिज न हो जाए।
बदले में क्या मिला? 74 साल की ढलती उम्र, जब हड्डियों को आराम की जरूरत थी, तब भी वे परिवार के दो वक्त के चूल्हे के लिए काम पर निकलने को मजबूर थे। न कोई सामाजिक सुरक्षा योजना, न कोई भविष्य निधि का सहारा।
रफ्तार का खूनी तमाचा: शाम 4 बजे काम खत्म कर जब यह बुजुर्ग अपने घर (कोनी, बिलासा ताल) की ओर निकला, तो वीआईपी सड़क पर बेखौफ दौड़ रही माजदा ने उन्हें रौंदकर सिस्टम के मुंह पर तमाचा जड़ दिया।
हाईकोर्ट बार, जिला प्रशासन और शासन के सामने सुलगते सवाल—अब सिर्फ ‘शोक’ जताएंगे या हक दिलाएंगे?
इस दर्दनाक मौत ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, श्रम विभाग और जिला प्रशासन के सामने एक बड़ा नैतिक सवाल खड़ा कर दिया है। क्या 50 साल तक न्याय के परिसर की सेवा करने वाले एक बुजुर्ग का परिवार अब सड़क पर भीख मांगेगा?
इस परिवार को तत्काल और असाधारण आर्थिक सहायता दिलाना अब कोई उपकार नहीं, बल्कि सिस्टम का नैतिक प्रायश्चित होना चाहिए:
हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार एसोसिएशन से 10 लाख का विशेष वेलफेयर फंड: जिस वकालत बिरादरी की सेवा में दीपक दास ने 50 साल होम कर दिए, उस बार एसोसिएशन और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की पहली जिम्मेदारी बनती है कि वे अपनी निधि और चंदे से पीड़ित परिवार को कम से कम 10 लाख रुपये की अंतरिम आर्थिक सहायता तुरंत जारी करें।
मुख्यमंत्री विशेष स्वेच्छानुदान से 20 लाख रुपये: जिस राज्य में आयोजनों और विज्ञापनों पर करोड़ों पानी की तरह बहाए जाते हैं, क्या वहाँ आधी सदी तक न्याय व्यवस्था की सेवा करने वाले एक कमजोर वर्ग के बुजुर्ग की शहादत पर मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान से 20 लाख रुपये की एकमुश्त राहत नहीं दी जा सकती?
कलेक्टर रेडक्रॉस से तत्काल राहत राशि: औपचारिकता पूरी होने का इंतजार किए बिना बिलासपुर कलेक्टर तत्काल रेडक्रॉस फंड से पीड़ित परिवार को 1 से 2 लाख रुपये की तात्कालिक सहायता सौंपें ताकि घर का चूल्हा बुझने से बच सके।
परिवार के एक सदस्य को अनुकंपा/सम्मानजनक रोजगार: परिवार का कमाऊ मुखिया छिन जाने के बाद उनके आश्रित को हाईकोर्ट परिसर, कलेक्टोरेट या किसी अधिवक्ता कार्यालय में स्थायी/संविदा स्तर पर सम्मानजनक रोजगार दिया जाए।
MACT ट्रिब्यूनल में फास्ट-ट्रैक क्लेम (50 लाख की क्षतिपूर्ति): माजदा वाहन मालिक और बीमा कंपनी के खिलाफ मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में विशेष फास्ट-ट्रैक बेंच के जरिए अधिकतम मुआवजे का अंतरिम आदेश 30 दिनों के भीतर पारित हो।
फाइलों के बोझ तले दबी आत्मा अब न्याय मांग रही है!
अगर आज भी अधिवक्ता समुदाय, शासन और न्यायपालिका एक साथ खड़े होकर इस 74 वर्षीय बुजुर्ग मुंशी के परिवार को उसका वाजिब हक और ऐतिहासिक मुआवजा नहीं दिला पाते, तो फिर हाईकोर्ट की दीवारों पर लिखे ‘सत्यमेव जयते’ के कोई मायने नहीं रह जाएंगे।