सकीट (एटा)। दशहरे के बाद कस्बा सकीट में टेसू-झांझी की पारंपरिक लोक संस्कृति की रौनक दिखाई देने लगी है। हाथों में रंग-बिरंगे टेसू और झांझी लेकर नन्हे बच्चे घरों और दुकानों पर पहुंच रहे हैं। पारंपरिक गीत गाकर बच्चे लोगों का मन मोह रहे हैं। इसके बदले लोग उन्हें खुशी-खुशी टॉफियां और रुपये दे रहे हैं।
इस परंपरा में सबसे ज्यादा उत्साह तीन, चार और पांच साल के छोटे बच्चों में देखने को मिल रहा है। नन्हे बच्चे टोलियां बनाकर गली-मोहल्लों और बाजार में निकलते हैं। हाथों में टेसू-झांझी की मूर्तियां लेकर गीत गाते हुए जब वे दुकानों और घरों पर पहुंचते हैं, तो लोग भी उन्हें खाली हाथ नहीं लौटाते। कोई टॉफियां देता है तो कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार रुपये देकर बच्चों का उत्साह बढ़ाता है।
ब्रज क्षेत्र में टेसू-झांझी की परंपरा दशहरे के बाद से शरद पूर्णिमा तक निभाई जाती है। इसमें बच्चे पारंपरिक लोकगीत गाते हुए घर-घर जाते हैं और नेग के रूप में रुपये या अन्य चीजें प्राप्त करते हैं। यह परंपरा बच्चों के मनोरंजन के साथ लोकगीतों और क्षेत्रीय संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
बदलते समय में भी सकीट में बच्चों का यह उत्साह लोक परंपराओं के प्रति लोगों के जुड़ाव को दर्शाता है। नन्हे बच्चों की टोलियां और उनके पारंपरिक गीत बाजारों व गलियों में त्योहार के बाद भी उत्सव जैसा माहौल बना रहे हैं।

