ब्यूरो चीफ सुंदरलाल जिला सोलन हिमाचल प्रदेश
देवदार और चीड़ के घने जंगलों तथा पहाड़ों की मनमोहक वादियों के बीच आयोजित तीन दिवसीय खुशवंत सिंह साहित्य महोत्सव-2026 का रविवार को समापन हो गया। कसौली के शांत वातावरण में आयोजित इस साहित्यिक महाकुंभ में तीन दिनों तक देश-विदेश से पहुंचे साहित्यकारों, लेखकों, कलाकारों, विचारकों और बुद्धिजीवियों ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार साझा किए।
इस वर्ष महोत्सव का विषय “असहमति की कला : विभाजनों के पार संवाद” रखा गया था। अंतिम दिन इतिहास, कला, सैन्य नेतृत्व, पर्यावरण संरक्षण, साहित्य और जीवन में स्थायी खुशियों की तलाश जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
रविवार सुबह कार्यक्रम की शुरुआत संदीप सिंह की मनमोहक संगीत प्रस्तुति से हुई। संगीत की मधुर धुनों ने साहित्य प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने अपने अनुभवों और विचारों से श्रोताओं को रूबरू करवाया।
ऑपरेशन ब्लू स्टार प्रशासनिक विफलता का परिणाम : प्रोबल दासगुप्ता
महोत्सव के अंतिम दिन का पहला महत्वपूर्ण सत्र “जनरल सुंदरजी : प्रशंसित या विवादित” विषय पर आयोजित किया गया। इसमें भारतीय भाषाविद्, लेखक एवं पूर्व सैन्य अधिकारी प्रोबल दासगुप्ता ने जनरल के. सुंदरजी के जीवन, सैन्य रणनीतियों और विवादास्पद निर्णयों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार सुनेत्रा चौधरी ने किया।
दासगुप्ता ने कहा कि जनरल सुंदरजी को उनकी असाधारण सैन्य रणनीतिक सोच के कारण “भारत का रोमेल” भी कहा जाता था। वह अपने समय से आगे की सोच रखने वाले सैन्य अधिकारी थे। हालांकि, उनका स्वभाव महत्वाकांक्षी, जल्दबाजी में निर्णय लेने वाला और दृढ़ निश्चयी था। ऐसे व्यक्तित्व के कारण कई बार गलत निर्णय होने की संभावना भी बनी रहती थी।
ऑपरेशन ब्लू स्टार का उल्लेख करते हुए दासगुप्ता ने इसे प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी विफलता बताया। उन्होंने कहा कि जनरल सुंदरजी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सीधे संपर्क स्थापित करके सैन्य प्रोटोकॉल को दरकिनार किया था।
उनके अनुसार तत्कालीन डिवीजन कमांडर मेजर जनरल बराड़ ने स्वर्ण मंदिर परिसर की घेराबंदी करने का सुझाव दिया था, लेकिन जनरल सुंदरजी की रणनीति अलग थी। उन्होंने तत्कालीन सेना प्रमुख की औपचारिक कमान व्यवस्था से आगे बढ़कर अपनी योजना को लागू करवाने का प्रयास किया।
इसके बाद भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में सैन्य कार्रवाई की, जिसके दुखद परिणाम सामने आए। दासगुप्ता ने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में खुफिया तंत्र की विफलता भी एक बड़ी वजह थी। सुरक्षा बलों, नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं था।
उन्होंने कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़े निर्णयों ने भारतीय इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।
बोफोर्स तोप सौदे पर भी उठाए सवाल
बोफोर्स तोप सौदे का उल्लेख करते हुए दासगुप्ता ने कहा कि भारतीय सेना ने अपने शुरुआती मूल्यांकन में इस तोप को अपेक्षाकृत कमजोर माना था। हालांकि, जनरल सुंदरजी ने इसकी खरीद को उचित बताया और अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का समर्थन किया।
इसके कुछ समय बाद सुंदरजी भारतीय सेना प्रमुख बने।
दासगुप्ता के अनुसार जनरल सुंदरजी हमेशा कहते थे कि “तोप सही थी, लेकिन सौदा सही नहीं था।”
उन्होंने यह भी बताया कि सुंदरजी ने बोफोर्स कंपनी से कथित कमीशन प्राप्त करने वालों के नाम सार्वजनिक करने की मांग की थी।
ऑपरेशन ब्रासटैक्स के दौरान युद्ध के करीब पहुंच गए थे भारत-पाकिस्तान
ऑपरेशन ब्रासटैक्स का जिक्र करते हुए दासगुप्ता ने बताया कि उस समय पाकिस्तान सीमा पर लगभग पांच लाख सैनिक तैनात किए गए थे।
जनरल सुंदरजी पाकिस्तान की रक्षा तैयारियों और सैन्य क्षमताओं की परीक्षा लेना चाहते थे। हालांकि, उनकी इस रणनीति से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव अत्यधिक बढ़ गया और दोनों देश एक खतरनाक स्थिति के करीब पहुंच गए।
दासगुप्ता ने कहा कि ऑपरेशन ब्रासटैक्स के दौरान भारत ने पाकिस्तान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने का अंतिम अवसर खो दिया था। यह उनका अपना आकलन था।
उन्होंने जनरल सुंदरजी को भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सेनापतियों में से एक बताया।
श्रीलंका और लिट्टे से जुड़े घटनाक्रम का भी उल्लेख
श्रीलंका से जुड़े घटनाक्रम पर चर्चा करते हुए दासगुप्ता ने कहा कि भारत ने शुरुआती दौर में लिट्टे को श्रीलंका सरकार के विरुद्ध संघर्ष में सहायता प्रदान की थी।
उन्होंने बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण से मुलाकात के दौरान उसे बुलेटप्रूफ जैकेट भी भेंट की थी। इसके लगभग चार वर्ष बाद राजीव गांधी की हत्या लिट्टे से जुड़े आतंकवादियों द्वारा कर दी गई थी।
चर्चा के दौरान यह भी सामने आया कि प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह की जनरल सुंदरजी के जीवन और विशेष रूप से ऑपरेशन ब्लू स्टार से संबंधित घटनाओं को दस्तावेजी रूप देने में गहरी रुचि थी।
दासगुप्ता ने कहा कि सुंदरजी एक बुद्धिमान, साहसी और निर्णायक सैन्य अधिकारी थे, लेकिन उनकी जल्दबाजी और वरिष्ठ अधिकारियों से आगे बढ़कर निर्णय लेने की प्रवृत्ति कई विवादों का कारण बनी।
प्रसिद्ध कलाकार सतीश गुजराल के जीवन और कला पर चर्चा
इसके बाद आयोजित सत्र में अमन नाथ और फिरोज गुजराल ने प्रसिद्ध चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और लेखक सतीश गुजराल के जीवन तथा उनकी कलात्मक विरासत पर प्रकाश डाला।
“सतीश गुजराल का जीवन और विरासत” विषय पर आयोजित चर्चा में वक्ताओं ने बताया कि सतीश गुजराल का योगदान केवल चित्रकला तक सीमित नहीं था। उन्होंने मूर्तिकला, वास्तुकला और साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
वक्ताओं ने उनके व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक संबंधों, व्यक्तित्व और जीवन के प्रति दृष्टिकोण से जुड़े अनेक संस्मरण साझा किए।
सतीश गुजराल की जन्मशती के अवसर पर आयोजित इस विशेष सत्र में भारतीय कला और वास्तुकला के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को याद किया गया।
चर्चा में यह भी बताया गया कि खुशवंत सिंह ने सतीश गुजराल के जीवन से जुड़ी घटनाओं को दस्तावेजी रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
पारिवारिक त्रासदी ने बदल दी डॉ. अरविंद लाल की जिंदगी
महोत्सव के एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र “कॉरपोरेट योगी : साधक से सीईओ तक” में पद्मश्री सम्मानित ब्रिगेडियर डॉ. अरविंद लाल ने अपने जीवन के संघर्षों और सफलता की यात्रा को साझा किया। इस सत्र का संचालन सेरेना जैकब ने किया।
डॉ. लाल ने वर्ष 1977 की उस दर्दनाक पारिवारिक घटना को याद किया, जिसने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी थी।
उन्होंने बताया कि उनके छोटे भाई ने उनके पिता डॉ. मेजर एस.के. लाल को गोली मार दी थी। इस घटना ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।
उस समय वह पुणे स्थित आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी में स्नातकोत्तर अध्ययन कर रहे थे और सहायक छात्रावास वार्डन के रूप में भी कार्यरत थे।
डॉ. लाल की इच्छा नौसेना में लड़ाकू विमान पायलट बनने की थी, लेकिन पिता की असामयिक मृत्यु के बाद उन्हें अपनी योजनाएं छोड़कर दिल्ली लौटना पड़ा और पारिवारिक व्यवसाय की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी।
उनके पिता ने वर्ष 1949 में एक डायग्नोस्टिक प्रयोगशाला की स्थापना की थी। डॉ. अरविंद लाल ने वर्ष 1977 में इसकी जिम्मेदारी संभाली और आधुनिक तकनीक, नई जांच सुविधाओं तथा बेहतर प्रबंधन के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया।
यही प्रयोगशाला आगे चलकर देश की प्रमुख डायग्नोस्टिक कंपनियों में शामिल डॉ. लाल पैथलैब्स के रूप में विकसित हुई।
डॉ. लाल ने अपनी पुस्तक “कॉरपोरेट योगी : माई जर्नी ऐज ए स्पिरिचुअल सीकर एंड एन एक्सीडेंटल एंटरप्रेन्योर” का भी उल्लेख किया।
वर्ष 2018 में प्रकाशित इस पुस्तक में उन्होंने बताया है कि किस प्रकार एक अप्रत्याशित पारिवारिक जिम्मेदारी ने उन्हें उद्यमिता के क्षेत्र में पहुंचाया और साथ ही आध्यात्मिक जीवन की खोज के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा कि व्यावसायिक सफलता के साथ आंतरिक शांति और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।
धीमी जीवनशैली अपनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश
महोत्सव में पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक जीवनशैली पर भी गंभीर चर्चा हुई।
“स्लो डाउन, यू मूव टू फास्ट” विषय पर आयोजित सत्र में श्रेया जानी ने गार्गी रावत के साथ बातचीत में तेज रफ्तार आधुनिक जीवन के दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने वंदना शिवा के साथ सह-लिखित अपनी पुस्तक “स्लो लिविंग : व्हाट यू कैन डू अबाउट क्लाइमेट चेंज” का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी जीवनशैली, उपभोग की आदतों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
श्रेया जानी ने बताया कि उन्होंने मात्र नौ वर्ष की आयु में सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था। लेकिन 13 वर्ष की उम्र में अत्यधिक गतिविधियों और मानसिक दबाव के कारण उन्हें थकावट तथा तनाव का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि आधुनिक समाज “समय की बीमारी” से ग्रस्त होता जा रहा है। लोग लगातार समय के पीछे भाग रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें लगता है कि उनके पास पर्याप्त समय नहीं है।
उन्होंने हल्दी वाले दूध का उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय घरों में वर्षों से उपयोग होने वाला यह साधारण पेय आज महंगे होटलों और कैफे में “गोल्डन लाटे” के नाम से बेचा जा रहा है।
उनका कहना था कि उपभोक्तावाद ने सामान्य जीवनशैली और पारंपरिक वस्तुओं को भी प्रतिष्ठा तथा विशेषाधिकार का प्रतीक बना दिया है।
उन्होंने धीमे और संतुलित जीवन के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अधिक सार्थक जनभागीदारी की आवश्यकता पर भी बल दिया।
इस सत्र में पर्यावरणविद् वंदना शिवा के विचारों और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली के महत्व पर भी चर्चा हुई।
साहित्य और कल्पनाओं की दुनिया से रूबरू हुए श्रोता
महोत्सव के अंतिम दिन साहित्य, कल्पना और कहानी लेखन से जुड़े विभिन्न सत्र भी आयोजित किए गए।
“घूल्स एंड गुड रीड्स” विषय पर शाइनी एंटनी और सत्यजीत सामंत ने साहित्य तथा कल्पनाशील लेखन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की।
इसके अतिरिक्त “आफ्टर खुशवंत्स हार्ट : द डेब्यूटेंट्स” सत्र में देवकी पांडे, शोभा श्रॉफ और डॉ. जतिंदर परवाज ने भाग लिया।
इस सत्र का उद्देश्य उभरते हुए साहित्यकारों और नए लेखकों को मंच प्रदान करना तथा साहित्य के प्रति उनकी सोच को सामने लाना था।
वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को समझने और विचारों को नई दिशा देने का सशक्त साधन भी है।
जीवन में स्थायी खुशी की तलाश पर हुआ मंथन
महोत्सव के समापन सत्र “द हैप्पीनेस लैब” में अखिल गुप्ता ने जीवन में वास्तविक सुख, मानसिक संतुलन और खुशियों की तलाश जैसे विषयों पर विचार रखे।
उन्होंने जीवन की भागदौड़ के बीच स्वयं के लिए समय निकालने और संतुलित जीवनशैली अपनाने के महत्व पर चर्चा की।
सत्र में यह संदेश दिया गया कि जीवन की वास्तविक खुशियां केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि संतोष, सकारात्मक सोच और सार्थक संबंधों में भी निहित होती हैं।
राहुल सिंह और मधुर सिंह ने किया सभी का आभार व्यक्त
तीन दिवसीय खुशवंत सिंह साहित्य महोत्सव के समापन अवसर पर प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह के पुत्र राहुल सिंह और मधुर सिंह ने कार्यक्रम में पहुंचे साहित्यकारों, लेखकों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, अतिथियों तथा साहित्य प्रेमियों का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि सभी प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी और विचारों के आदान-प्रदान ने इस आयोजन को विशेष बनाया।
इसके बाद रेने सिंह ने “बियॉन्ड द लास्ट पेज : केएसएलएफ सॉन्ग टू रिमेंबर” के अंतर्गत संगीतमय प्रस्तुति दी, जिसने समापन समारोह को यादगार बना दिया।
अंत में आयोजित चाय समारोह के दौरान साहित्यकारों और अतिथियों ने एक-दूसरे के साथ अपने अनुभव साझा किए।
इसी के साथ कसौली की खूबसूरत वादियों में तीन दिनों तक चला साहित्य, कला, इतिहास, पर्यावरण और वैचारिक संवाद का यह महोत्सव अगले वर्ष फिर मिलने की उम्मीद के साथ संपन्न हो गया।
