
पटाखों की खरीदारी के लिए पहुंच रहे लोग अपनी गाड़ियां सड़क किनारे खड़ी करते रहे, जिससे वाहनों की आवाजाही के लिए रास्ता लगातार संकरा होता चला गया। हाईवे से जुड़े इस मार्ग पर वाहनों की लंबी कतारें लगने लगीं और जाम का असर सीधे ज़ीरकपुर–शिमला हाईवे पर दिखाई देने लगा। हालात ऐसे रहे कि आम लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए 1 से 2 घंटे तक भीषण जाम में फंसे रहना पड़ा।
हैरानी की बात यह है कि दिवाली और धनतेरस जैसे बड़े त्योहारों के दौरान भारी भीड़ और यातायात के दबाव का अंदाजा पहले से लगाया जा सकता था। इसके बावजूद पटाखों के स्टॉल के आसपास पार्किंग की कोई प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था नजर नहीं आई। सड़क पर बेतरतीब खड़ी गाड़ियों ने न केवल स्थानीय यातायात को प्रभावित किया, बल्कि मुख्य हाईवे से गुजरने वाले वाहन चालकों को भी भारी परेशानी में डाल दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन को त्योहारों के दौरान भारी भीड़ जुटने की जानकारी थी, तो यातायात को सुचारू रखने के लिए पहले से कोई ठोस ट्रैफिक प्लान क्यों नहीं बनाया गया? पटाखों के स्टॉल लगाने की व्यवस्था तो कर दी गई, लेकिन उनके कारण पैदा होने वाली पार्किंग और ट्रैफिक की समस्या को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?
प्रशासन और पुलिस से सवाल:
- पटाखों के स्टॉल के आसपास पार्किंग के लिए अलग व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
- सड़क पर बेतरतीब खड़ी गाड़ियों को हटाने के लिए प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- जब जाम का असर मुख्य हाईवे तक पहुंच गया, तो यातायात नियंत्रण के लिए पर्याप्त पुलिस बल कहां था?
- क्या आम जनता को त्योहारों के दौरान घंटों जाम में फंसे रहने के लिए छोड़ देना ही प्रशासन का ट्रैफिक मैनेजमेंट है?
त्योहारी सीजन में व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत आम जनता के समय और सुविधा से नहीं चुकाई जानी चाहिए। प्रशासन की जिम्मेदारी केवल स्टॉल लगाने की अनुमति देने तक सीमित नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि आम लोगों का आवागमन बाधित न हो।
अब सवाल यह है कि क्या संबंधित प्रशासन इस गंभीर अव्यवस्था का संज्ञान लेकर जिम्मेदारी तय करेगा या फिर हर साल की तरह इस बार भी आम जनता को ही परेशानी झेलनी पड़ेगी?
जब त्योहारों की खरीदारी के कारण मुख्य हाईवे घंटों जाम रहे, तो आखिर प्रशासन और ट्रैफिक पुलिस की जवाबदेही कौन तय करेगा?
