झिरिया का पानी पीने मजबूर, बैगा जनजाति, जिले में निष्क्रीय पीएचई विभाग और सत्ता सुख भोगते क्षेत्र के मिनरल वाटर पीने वाले जनप्रतिनिधियों को नहीं ग्रामीणों की सुध……… प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले की समनापुर जनपद के बैगा बहुल ग्राम सरईमाल की बैगा जनजाति की महिलाएं पीने के पानी के लिए सूखी हुई नदी में खोदी गई गड्ढें नुमा झिरिया से पीने के लिए पानी निकालकर अपने घर उपयोग के लिए लेकर जाती है। गड्ढे में भरा हुआ यह पानी पीने के काबिल तो नहीं है पर इन जनजाति ग्रामीणों की मजबूरी है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी शासन – प्रशासन उनके लिए शुद्ध और साफ पीने का पानी उपलब्ध नहीं करा सका है। जबकि जिले में पीएचई विभाग के पास न तो फंड की कमी है न साधन और संसाधनों की। हर क्षेत्र में उनका अमला पदस्थ है साथ ही ठेकेदार सेवाएं दे रहे है जिन्हे विभाग मोटी रकम देता है, फिर भी परिणाम जस के तस है। ग्रामीणों को बूंद बूंद पानी के लिए भटकना पड़ रहा है और गंदा पानी पीने को मजबूर है लोग। यह ग्राम तो मात्र उदाहरण है बैगा जनजाति क्षेत्रो में लगभग आधे से अधिक गांवों में यही स्थिति है जहां लोगों को पानी के लिए परेशान होना पड़ता है भटकना पड़ता है। बताया जाता है ठेकेदारों को भुगतान तो चार सौ, पांच सौ फीट खनन का किया जाता है किन्तु हैंडपंपों में पाईप सौ से डेढ़ सौ फीट ही डाला जाता है और गर्मियों में इनका जल स्तर नीचे चला जाता है। वहीं पहाड़ी इलाके में नदिया और नाले भी सूख जाने से ग्रामीण इन जल स्रोतों के आसपास गड्ढे खोद कर पीने का पानी का इंतजाम कैसे भी करते है। इन्हीं गड्ढों में जानवर भी पानी पीते है और यही से जिले के ग्रामीण भी पीने का पानी ले कर जाते है।
प्रशांत सिंह सिसोदिया ब्यूरो चीफ जिला डिंडोरी मध्य प्रदेश