वरिष्ठ पत्रकार तस्लीम बेनकाम की कलम से
वास्तविक पत्रकारों की मर्यादा और पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण विधा को अपराध और अपराधियों के चंगुल से कैसे बचाया जाए? और आखिर बचायेगा कौन..?
यह कैसा दौर.!ओर कैसी पत्रकारिता..!
अपनी बेबाक लेखनी का लोहा मनवाने वाले महायोद्धा पत्रकारों के कारण ही समाज में आज भी प्रतिष्ठा बनी हुई..!
यह कैसा दौर,
ओर कैसी पत्रकारिता,शहर हो या देहात जो पत्रकारिता को कर रहें शर्मशार, जिसको देखों वह पत्रकार का चोला पहनकर अधिकारियों में अपना रशुख दिखा रहा हैं या उस अधिकारी की खामियों पर ब्लैक मेल करता हुआ नजर आ रहा है! लेकिन ऐसे महायोद्धा पत्रकार भी समाज मे हैं जिन्होंने अपनी बेबाक लेखनी से समाज को एक नई दिशा दी है और अपनी लेखनी का लोहा भी मनवाया हैं ऐसे ही महायोद्धा पत्रकारों के कारण ही आमजन में व समाज में आज भी प्रतिष्ठा बनी हुई है लेकिन कुछ ऐसे पत्रकारों के कारण समाज मे पत्रकार को अच्छी नजर से नही देखा जाता।ऐसे भी लोग पत्रकारिता में आ गए हैं जो पहले गुंडागर्दी किया करते थे,तथा सट्टे का कारोबार,गाड़ी ड्राइवर का काम,मोबाईल सही करने का काम करते थे तथा कुछ लोग तो ऐसे भी जो सिलाई मास्टर,गोबर उठाना,कटाई करना जैसे कार्य करते थे जो अब पत्रकार का चोला या संपादक बन बैठे हैं!ऐसे एक नही अनेकों लोग हैं जो पत्रकारिता की आड़ में आज भी अपने ग़लत कार्यो को अंजाम दे रहें है,सच तो यह भी हैं कि इनकी एजुकेशन इतनी हैं कि सुनकर भी अधिकारी सकते में रह जाते हैं!अगर देखा जाएं तो आमजन की आवाज़ उठाकर उसको इंसाफ दिलाना ही पत्रकारिता हैं तथा सामाजिक सरोकारों तथा सार्वजनिक हित से जुड़कर ही पत्रकारिता सार्थक बनती है। सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाओं को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है!
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा पाया (स्तम्भ) भी कहा जाता है। पत्रकारिता ने लोकतंत्र में यह महत्त्वपूर्ण स्थान अपने आप नहीं हासिल किया है बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों के महत्त्व को देखते हुए समाज ने ही दर्जा दिया है। कोई भी लोकतंत्र तभी सशक्त है जब पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी सार्थक भूमिका निभाती रहे। सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य ही यह होना चाहिए कि वह प्रशासन और समाज के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी की भूमिका अपनाये।
लेकिन यहां तो अपराधियों का पत्रकारिता की ओर रुख समाज के लिए खतरा ग्लैमर की चाह और पुलिस-प्रशासन के बीच बैठकर अपने ग़लत कार्यो पर अपने रिश्ते बनाकर चादर डालते देखा जा रहा हैं तो वही जहां पहले अपराधी किसी राजनीतिक हस्ती या पार्टी का दामन थाम लेते थे, वहीं वर्तमान में अब यह ट्रेंड बदल गया है!कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग अब पत्रकारिता की तरफ रुख कर रहे हैं।क्योंकि इसमें पढ़ाई की आवश्यकता तो हैं नही इसलिए पत्रकारिता वर्तमान में अपराधियों का सबसे पसंदीदा क्षेत्र बनता जा रहा है।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ वेब, पोर्टल और सोशल मीडिया जैसे दूसरे साधन कुछ वर्षों में आ जाने के बाद कोई भी शख्स कभी भी खुद को छायाकार या पत्रकार खुद ही घोषित कर दे रहा है। दुखद पहलू ये है कि जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसमें कभी बुद्धिजीवी और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए लोग आते थे, जबकि आज अंधाधुंध अखबारों, पत्रिकाओं, वेब पोर्टल्स के आ जाने के बाद बड़ी संख्या में अपराधियों को भी ‘प्रेस’ लिखने का सुनहरा मौका मिल गया है। इसके सहारे वो न सिर्फ़ अपने पुराने अपराधों को छुपाए हुए हैं, बल्कि नये अपराधों को भी जन्म देकर, पुलिस और प्रशासन पर अपनी पकड़ भी मजबूत कर रहे हैं। वे तमाम तरह के गैरकानूनी कार्य पत्रकारिता की आड़ में संचालित करने में कोई संकोच नही करते हैं।कुछ लोग खुद को मीडियाकर्मी बताते घूम रहे हैं। इनकी संख्या भी सैकड़ों में मिल जायेगी। अब बड़ा सवाल ये है कि वास्तविक पत्रकारों की मर्यादा और पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण विधा को अपराध और अपराधियों के चंगुल से कैसे बचाया जाए? और आखिर बचायेगा तो कौन?
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़