✍️राजेश कुमार तिवारी इंडियन टीवी न्यूज़
उपेक्षा की मार झेल रही 200 साल पुरानी बावली, संरक्षण मिला तो बन सकती है कटनी का नया पर्यटन केंद्र,
कटनी। बहोरीबंद तहसील के ग्राम धूरी (बंधी) में स्थित लगभग 200 वर्ष पुरानी दो मंजिला ऐतिहासिक बावली आज उपेक्षा और बदहाली का शिकार बनी हुई है। कभी जल संरक्षण और सामाजिक जीवन का केंद्र रही यह प्राचीन धरोहर वर्तमान में मलबे, कचरे और गाद से पटी पड़ी है। हालांकि बावली की दीवारों पर जड़ी कलात्मक प्रतिमाएं और इसकी भव्य स्थापत्य शैली आज भी इसके गौरवशाली इतिहास की गवाही दे रही हैं।
स्थानीय नागरिक एवं विरासत प्रेमी राजेंद्र सिंह ठाकुर द्वारा साझा की गई तस्वीरों में बावली की जर्जर स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है। पत्थरों से निर्मित मजबूत संरचना, मेहराबदार प्रवेश द्वार, दो मंजिला निर्माण शैली और दीवारों पर उकेरी गई दुर्लभ प्रतिमाएं इस ऐतिहासिक धरोहर की सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्ता को दर्शाती हैं।
जानकारी के अनुसार इस बावली का निर्माण लगभग दो शताब्दी पूर्व क्षेत्र के मालगुजार बाबू बालगोविंद दुबे द्वारा कराया गया था। उस समय यह बावली वर्षा जल संरक्षण, पेयजल आपूर्ति और सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। साथ ही यह क्षेत्र की समृद्ध शिल्पकला और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण भी मानी जाती है।
महाकौशल क्षेत्र का कटनी जिला पहले से ही अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, प्राचीन मंदिरों, जैन प्रतिमाओं और जल संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है। बहोरीबंद क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। ऐसे में धूरी (बंधी) की यह प्राचीन बावली भी संरक्षण मिलने पर जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश शासन के जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत इस बावली की साफ-सफाई, गहरीकरण और मरम्मत कराई जाए तो न केवल इसकी ऐतिहासिक पहचान संरक्षित होगी, बल्कि जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। साथ ही यह क्षेत्र के पर्यटन विकास और स्थानीय रोजगार के लिए भी नई संभावनाएं पैदा कर सकती है।
ग्रामीणों और विरासत संरक्षण से जुड़े लोगों ने जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और ग्राम पंचायत से मांग की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को उपेक्षा से बाहर निकालकर संरक्षित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सकें।
अब देखना यह होगा कि जल संरक्षण और विरासत संरक्षण की दिशा में चल रहे अभियानों के बीच इस ऐतिहासिक बावली को नया जीवन कब मिलता है।