वर्दी में इंसान ही होते है, रील बनाने वाले पुलिस कर्मियों पर सवाल क्यों?
वेतन विसंगति, छुट्टी की समस्या, कार्य का तनाव, तबादला में बार्डर स्कीम का खत्म होना जैसी समस्याएं इस पर भी बात हो!
इन दिनों महिला पुलिसकर्मियों द्वारा सोशल मीडिया पर बनाए गए रील्स को लेकर जो उबाल समाज में देखने को मिल रहा है, वह कहीं न कहीं हमारे सोचने-समझने की क्षमता और दोहरे मापदंडों को उजागर करता है। सोशल मीडिया पर एक सामान्य रील को लेकर की गई आलोचना, न केवल अत्यधिक प्रतिक्रियाशील प्रतीत होती है, बल्कि पुलिस महकमे की सबसे निचली कड़ी-कास्टेबल रैंक के मनोबल को भी बुरी तरह तोड़ने का काम करती है।क्या वर्दी पहन लेने के बाद एक पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत पहचान समाप्त हो जाती है? क्या उसका हंसना, मुस्कराना, थोड़ा बहुत रचनात्मक या हल्का पल जी लेना अपराध बन जाता है? कास्टेबल चाहे महिला हो या पुरुष-भी हमारी ही तरह समाज का हिस्सा हैं। वे भी उसी परिवेश से आते हैं, जहां अभिव्यक्ति की आजादी एक मौलिक अधिकार है। लेकिन जब वही व्यक्ति वर्दी पहनता है, तो उससे एकदम मशीनी व्यवहार की अपेक्षा की जाती है-जिसमें न कोई थकान, न कोई भाव, न कोई व्यक्तिगत जीवन।पुलिसकर्मी लगातार ड्यूटी पर रहते हैं, उन्हें कई बार त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों या बच्चों के जन्मदिन तक में शामिल नहीं होने दिया जाता। ड्यूटी का तनाव, सामाजिक अपेक्षाएं, संसाधनों की कमी और वेतन संबंधी विसंगतियों से वह पहले ही जूझ रहे होते हैं। ऐसे में यदि वे थोड़ी देर सोशल मीडिया पर रील बनाकर खुद को मानसिक राहत देने का प्रयास करते हैं तो क्या इसे अपराध की तरह देखा जाना चाहिए?
यह बहुत चिंताजनक है कि समाज में हर विषय को नैतिकता की कसौटी पर तौलने वाले स्वयं कितनी बार आत्मनिरीक्षण करते हैं? जब एक कास्टेबल रील बनाता है-बिना अश्लीलता, बिना शस्त्र प्रदर्शन, बिना गोपनीयता के उल्लंघन के तो उसकी नीयत पर उंगली उठाना कहां तक जायज है?क्या समाज की यही नैतिक दृष्टि तब जागती है जब अफसरशाही या सत्ता से जुड़े लोग अपने बच्चों की जन्मदिन पार्टी में सरकारी संसाधनों का प्रयोग करते हैं? क्या तब मीडिया उतना ही सक्रिय रहता है, जब कोई सिपाही आत्महत्या कर लेता है, थकान या मानसिक तनाव के कारण?दुखद बात यह है कि नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन क्या हर बात पर ‘अनुशासन का डंडा’ चलाना न्यायसंगत है? यदि एक रचनात्मक वीडियो या भावनात्मक रील पुलिस की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचा रही, तो उसे लेकर विभागीय जांच या निलंबन की चेतावनी क्या मानसिक उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आती? पुलिस महकमा केवल आदेश और अनुसरण की मशीनरी नहीं है, वह भी इंसानी जज्बातों से बनी संस्था है। वरिष्ठ अधिकारियों का यह दायित्व है कि वे मातहतों की भावनाओं को भी समझें, उन्हें प्रोत्साहित करें और उनके मन की स्थिति पर ध्यान दें।मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हैलेकिन इस स्तंभ से उम्मीद होती है कि वह जनभावनाओं को समझे, न कि उन्हें भड़काए। पुलिसकर्मी के एक रील को “वर्दी का मजाक” बता देना, या “पुलिस की गिरती गरिमा” के शीर्षक से चलाना-समाज के उस वर्ग को बदनाम करने जैसा है जो अपने प्राण जोखिम में डालकर हमारी सुरक्षा करता है।हर रील में न तो अपराध छिपा होता है और न ही हर पुलिसकर्मी सोशल मीडिया पर अपनी वर्दी का मखौल उड़ाता है। फर्क करना सीखिए। तस्लीम बेनकाब
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़