केशव साहू जिला ब्यूरो
डोंगरगढ़/राजनांदगांव।
जामरी–मुड़पार मुख्य मार्ग पर प्रस्तावित पुल वर्षों से ग्रामीणों के लिए दर्द का पुल बना हुआ है। न पिछली कांग्रेस सरकार में इसका निर्माण हो सका, और अब भाजपा सरकार में भी इसके बनने को लेकर हालात स्पष्ट नहीं हैं। बरसों से ग्रामीण परेशान हैं, वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी असहज स्थिति में नजर आ रहे हैं।
सूत्रों व विभागीय अधिकारियों के अनुसार पुल निर्माण के लिए 72 से 80 लाख रुपये के बजट का आकलन किया गया है। बावजूद इसके, न बजट स्वीकृत हो पा रहा है, न निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। हाल ही में कलेक्टर के जनदर्शन में ग्रामीणों व जनप्रतिनिधियों ने जब समस्या उठाई, तो वहां मौजूद जिला सीईओ ने साफ तौर पर कहा कि “इतनी राशि जिला स्तर से देना संभव नहीं है, इसके लिए राजस्व मंत्री का सहारा लेना होगा।”
इस बयान के बाद ग्रामीणों में आक्रोश है। सवाल उठ रहा है कि जब समस्या स्थानीय है, जनता रोज़ाना जूझ रही है, तो फिर जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या हर विकास कार्य के लिए मंत्री तक दौड़ लगाना ही पड़ेगा? जिला प्रशासन हाथ खड़े कर दे तो ग्रामीण जाएं कहां?
बरसात के मौसम में हालात और बदतर हो जाते हैं—
आवागमन बाधित
स्कूली बच्चों की पढ़ाई प्रभावित
मरीजों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल
किसानों की उपज बाजार तक नहीं पहुंच पाती
ग्रामीणों का कहना है कि हर सरकार में सिर्फ आश्वासन मिलते हैं, लेकिन जमीन पर काम शून्य है। जनप्रतिनिधि आते-जाते रहे, अधिकारी बदलते रहे, मगर पुल आज तक नहीं बना।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है—
क्या जामरी–मुड़पार के ग्रामीणों को एक साधारण पुल के लिए भी राजस्व मंत्री की चौखट खटखटानी पड़ेगी?
या फिर यह मामला भी वर्षों की तरह फाइलों में दबा रहेगा?
ग्रामीणों की मांग है कि तत्काल बजट स्वीकृति दी जाए टेंडर प्रक्रिया शुरू हो निर्माण कार्य समयबद्ध पूरा किया जाए
अगर अब भी ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो यह मुद्दा आने वाले समय में बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है। जनता अब सिर्फ आश्वासन नहीं, काम चाहती है।