राजेश कुमार तिवारी इंडियन टीवी न्यूज़
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली पत्रकारिता आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां खबरें तो दिखाई जा रही हैं, लेकिन सवाल कहीं खोते जा रहे हैं। कभी पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने के लिए जाने जाते थे, लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कई मंचों पर सिर्फ बयान सुनाए जाते हैं, जवाब नहीं मांगे जाते।
पत्रकार का सबसे बड़ा धर्म होता है जनता की आवाज बनना। जनता जिन समस्याओं से जूझ रही है, उन मुद्दों को शासन-प्रशासन के सामने मजबूती से रखना ही असली पत्रकारिता कहलाती है। लेकिन जब पत्रकार सवाल पूछना ही भूल जाएं, तो फिर आम आदमी की परेशानियों को कौन उठाएगा?
आज शहरों में गंदा पानी आ रहा है, बिजली कटौती से लोग परेशान हैं, सड़कों की हालत खराब है, अस्पतालों में सुविधाएं अधूरी हैं, लेकिन कई बार प्रेस कॉन्फ्रेंस सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। कठिन सवालों की जगह सिर्फ प्रशंसा और बयानबाजी सुनाई देती है। यही वजह है कि जनता के बीच पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
पत्रकारिता का उद्देश्य किसी की छवि चमकाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है। एक मजबूत पत्रकार वही होता है जो सत्ता, प्रशासन और जिम्मेदार लोगों से जनता के हित में सवाल पूछने का साहस रखे। क्योंकि सवाल ही जवाबदेही तय करते हैं और जवाबदेही से ही व्यवस्था सुधरती है।
अगर पत्रकार सवाल पूछना बंद कर देंगे, तो फिर लोकतंत्र की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वक्त की जरूरत है कि पत्रकार फिर से अपने मूल दायित्व को समझें और जनता के मुद्दों पर बेबाकी से सवाल करें। क्योंकि जब सवाल जिंदा रहते हैं, तभी लोकतंत्र भी मजबूत रहता है।