सहारनपुर की राजनीति में दो दिन पहले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने जिस अंदाज में विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन करके अपनी ताकत दिखाई। उसने साफ संदेश दिया कि यहां कांग्रेस अब “कमजोर सहयोगी” की भूमिका में रहने वाली नहीं है। मंच से लेकर भीड़ तक सब कुछ यह बताने के लिए पर्याप्त था कि मुस्लिम राजनीति का सबसे बड़ा जमीनी चेहरा बनने की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
इमरान मसूद की राजनीति हमेशा आक्रामक शैली, भीड़ जुटाने की क्षमता और सीधी चुनौती देने के अंदाज पर टिकी रही है। उनका सम्मेलन केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि समाजवादी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक और स्थानीय नेतृत्व को सीधी चेतावनी भी था कि सहारनपुर में कांग्रेस अभी जीवित ही नहीं बल्कि संघर्ष की मुद्रा में है
इसी के ठीक बाद सांसद इकरा हसन की सक्रियता ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। अचानक सहारनपुर में सक्रियता बढ़ना, लगातार राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराना और खुद को संघर्षशील चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश ! यह सब केवल संयोग मानना मुश्किल है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इमरान मसूद के शक्ति प्रदर्शन के बाद समाजवादी पार्टी को यह एहसास हुआ कि यदि जमीन पर अपनी मौजूदगी तुरंत नहीं दिखाई गई तो सहारनपुर में उसका पारंपरिक आधार और कमजोर हो सकता है।
असल में यह लड़ाई केवल भाजपा बनाम विपक्ष की नहीं है। यह लड़ाई विपक्ष के भीतर “चेहरे” की भी है। इमरान मसूद वर्षों से सहारनपुर की मुस्लिम राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उनका अपना कैडर, अपना नेटवर्क और अपनी आक्रामक राजनीतिक पहचान है। दूसरी तरफ इकरा हसन को नई पीढ़ी के युवा और सॉफ्ट इमेज वाले चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। लेकिन राजनीति में केवल चेहरा काफी नहीं होता, जमीन पर पकड़ भी उतनी ही जरूरी होती है।
यही कारण है कि अब सहारनपुर में यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि समाजवादी पार्टी कहीं अपने खिसकते वोट बैंक को लेकर अंदर ही अंदर चिंतित तो नहीं है। क्योंकि पिछले चुनावों में गठबंधन की राजनीति ने भले आंकड़े संभाल लिए हों, लेकिन जमीनी स्तर पर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। इमरान मसूद का सम्मेलन इसी बेचैनी को और उजागर कर गया।
सहारनपुर की जनता यह सब बहुत ध्यान से देख रही है। यहां लोग केवल भाषणों और सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होते। यहां यह भी देखा जाता है कि किस नेता की पकड़ कार्यकर्ताओं पर कितनी है, किसकी पहुंच गांव तक है और कौन केवल राजनीतिक माहौल देखकर सक्रिय होता है। आने वाले समय में सहारनपुर की राजनीति शायद भाजपा-विपक्ष की सीधी लड़ाई से ज्यादा, विपक्ष के भीतर नेतृत्व की इस प्रतिस्पर्धा के कारण चर्चा में रहने वाली
रमेश सैनी सहारनपुर इंडियन टीवी न्यूज़