केशव साहू जिला राजनादगांव
डोंगरगढ़ वन विभाग में इन दिनों तानाशाही अपने चरम सीमा पर देखी जा सकती है। ताजा मामला वन विभाग में परस्थ संजय कुमार जायसवाल का बताया जा रहा है । उनकी तानाशाही तथा अड़ियल रवैये से विभागीय सहकर्मी भी हताश एवं निराश हो चुके हैं। विवादों से इनका पुराना नाता रहा है।
संजय कुमार जायसवाल वनपाल (फॉरेस्टर) को कटेमा सर्किल प्रभारी के पद पर 2019-20 में इनको विभागीय प्रभार दिया गया था। श्री जायसवाल को कटेमा सर्किल का प्रभार मिलते ही तमाम तरह के भ्रष्टाचार तथा सहकर्मियों के साथ वाद विवाद करते हुए मानसिक प्रताड़ना का भी मामला वरिष्ठ अधिकारियों के सामने समय पर वन कर्मियों द्वारा लिखित तथा मौखिक शिकायत किया जाता रहा परंतु अधिकारियों के मिली भगत से सभी आरोपो तथा विवादों को दबाया जाता रहा है। पूर्व में सहकर्मियों के साथ वाद विवाद की समस्या को देखते हुए जनवरी 2024 में तत्कालीन D.F.O राजनांदगांव सलमा फारूकी द्वारा इनका ट्रांसफर एलबी नगर काष्ठागर में किया गया था । परंतु लोकसभा चुनाव अवधि में कोर्ट से स्टे लेकर पुनः कटेमा सर्किल में ही अधिकारियों की मिली भगत से कार्य करते रहे। दिनांक 12/3/25 को विभागीय पद में समिति की अनुशंसा के बाद श्री जायसवाल को वनपाल से उपवन क्षेत्रपाल के पद पर पद उन्नति दी गई निर्माता पद उन्नति होने के पश्चात स्थानांतरण का प्रावधान है मगर वह आज भी नियम विरुद्ध तरीके से कटेमा सर्कल में ही कार्यरथ हैं।
*मुख्यालय में नहीं रहते हैं श्री जायसवाल* वन विभाग के अधिकतर वरिष्ठ अधिकारी तथा कर्मचारी मुख्यालय में रहकर अपने-अपने क्षेत्र में निरंतर कार्य करते हैं। जो शासन का दिशा निर्देश भी है। मगर शासन के दिशा निर्देश की खुल्लम-खुल्ला धज्जी उड़ाने वाले संजय कुमार जायसवाल राजनांदगांव से डोंगरगढ़ प्रतिदिन आवागमन करते हैं । नियमित अपने क्षेत्र का दौरा भी नहीं करते हैं। राजनांदगांव से डोंगरगढ़ की दूरी 45 किलोमीटर तथा डोंगरगढ़ से कटेमा की दूरी 50 किलोमीटर है। श्री जायसवाल कुल मिलाकर आने-जाने मे प्रतिदिन 200 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि वह क्षेत्र में और अपने विभागीय कार्य में कितना समय देते होंगे। उपवन मंडल अधिकारी डोंगरगढ़ में नियमित रहती हैं । वन परिक्षेत्र अधिकारी भी डोंगरगढ़ में नियमित रहते हैं । परंतु सहायक परिक्षेत्र अधिकारी डोंगरगढ़ में नहीं रहते हैं वह अपने निज निवास पाताल भैरवी मंदिर राजनंदगांव से रोज डोंगरगढ़ आना-जाना करते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि श्री जायसवाल का मुख्यालय डोंगरगढ़ उत्तर बोर तालाब है पोस्टिंग कटेमा सर्कल में है। विभाग द्वारा उन्हें विभागीय घर भी अलॉट किया गया है जहां पर कोई रहता नहीं है।
*नियमित कर्मचारी की करते हैं अनदेखी तथा प्रताड़ित*
वन विभाग के शासकीय कर्मचारियों को नजर अंदाज करके सुरक्षा श्रमिक एवं मुंशी के मिली भगत से सर्किल का संचालन विगत 6 वर्षों से करते चले आ रहे हैं। पर्याप्त शासकीय कर्मचारी सर्कल में रहने के बावजूद चपरासी तथा दैनिक श्रमिक को कूप कटाई का प्रभारी बनाकर कर रहे अपनी मनमानी।
*वर्ष 2021 में हुआ था करोड़ों का घोटाला कौन बचा रहा है भ्रष्ट कर्मचारियों व अधिकारी को जांच के नाम पर खाना पूर्ति*
करोड़ों की शासकीय राशि के गबन का ऐसा तरीका अपनाया गया कि सुनकर दिमाग चकरा जाए. ग्रामीणों के बैंक खातों में मजदूरी के पैसे डाले गए और फिर लालच देकर उनसे वापस भी ले लिए गए. मजेदार बात यह है कि जिन लोगों के नाम पर भुगतान हुआ, उनमें एक गर्भवती महिला और एक नाबालिक स्कूली छात्र भी शामिल है! जब डोंगरगढ़ वन परिक्षेत्र के बोरतलाव और खैरागढ़ जिले के कटेमा गांव में बांस-भिर्रा कटाई, मिट्टी चढ़ाई और फेंसिंग जैसे कार्यों के लिए शासन ने करोड़ों रुपए की राशि स्वीकृत की थी. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है.
सूत्रों के अनुसार, इन कार्यों के नाम पर ग्रामीणों के खातों में करोड़ों रुपए जमा किए गए, लेकिन असल में कोई काम हुआ ही नहीं. फिर क्या? वन विभाग के कर्मचारियों ने ग्रामीणों को झांसा देकर बैंक से पैसे निकलवाए और वापस ले लिए. बदले में उन्हें महज 1000 रुपये का झुनझुना थमा दिया गया!
गर्भवती महिला के नाम पर फर्जी भुगतान
भ्रष्टाचार की हद तो तब पार हो गई जब इस खेल में गर्भवती महिला और स्कूली छात्र तक को घसीट लिया गया. बछेराभाठा की एक महिला, जो उस वक्त गर्भवती थी, के नाम पर मजदूरी का भुगतान दिखाया गया. अब सवाल यह उठता है कि जो महिला उस समय गर्भवती थी, वह भला मजदूरी कैसे कर सकती थी?स्कूली छात्र को कागज में बना दिया मजदूर
पीड़िता लोकेश्वरी सिन्हा ने बताया कि उसने कभी वन विभाग में काम नहीं किया, फिर भी उसके खाते में पैसे डाले गए और बाद में उससे वापस ले लिए गए. इसी तरह, ग्राम भंडारपुर के एक स्कूली छात्र हेमंत कुमार के नाम पर भी फर्जी भुगतान हुआ. स्कूल के प्रिंसिपल माधुरी साहू ने पुष्टि की कि वह छात्र रोजाना कक्षा में उपस्थित रहता था, लेकिन सरकारी कागजों में वह ‘वन विभाग में मजदूरी’ कर रहा था!
वन विभाग के इस गंभीर वृत्तीय भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची, वहां से दस्तावेज भी मिले, मगर जांच फिर उन्हीं अफसरों को सौंप दी गई जो खुद इस भ्रष्टाचार के गुनहगार हैं. ऐसे में कार्रवाई की उम्मीद कैसे की जाए? मामला जितना बड़ा, उतनी ही गहरी इसकी जड़ें!
*बड़ी मछलियों के शामिल होने की आशंका*
करोड़ों के इस घोटाले में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी ही नहीं, बल्कि बड़े अधिकारियों के शामिल होने की भी आशंका जताई जा रही है. यही वजह है कि भ्रष्टाचार साबित होने के बावजूद किसी पर कार्रवाई नहीं हो रही. डोंगरगढ़ वन विभाग का यह घोटाला भ्रष्टाचार का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है. सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसे घोटाले होते रहेंगे और कब तक शासन-प्रशासन आंखें मूंदे रहेगा?
*जांच के नाम पर अधिकारी ने साधी चुप्पी*
बहरहाल, जिम्मेदारों ने इस घोटाले की जांच करने फिर से एक तीन सदस्यीय कमेटी गठित की है, जिसमें डोंगरगढ़ तहसीलदार मुकेश ठाकुर, उप वनमंडलाधिकारी पूर्णिमा राजपूत और मनरेगा अधिकारी विजय प्रताप सिंह को शामिल किया गया है लेकिन इस जांच कमेटी को बने भी अब तीन माह बीत चुके हैं अधिकारी अभी भी जांच का हवाला देकर चुप्पी साधे बैठे हैं.