राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता। न दोस्ती स्थायी, न दुश्मनी स्थायी। स्थायी सिर्फ एक चीज है और वो है जनता का फैसला। 3 अगस्त 2026 को हुए तीन राज्यों के उपचुनाव ने फिर यही बात दोहराई। मध्य प्रदेश का दतिया, बिहार का बांकीपुर और गुजरात का मंजलपुर। तीन दिशाएं, तीन संदेश।
गुजरात का परिणाम अपेक्षित था, पर दतिया और बांकीपुर ने सियासत की जमीन हिला दी। बांकीपुर में 30 साल का किला ढहा और दतिया में सत्ता पक्ष की सीट विपक्ष के खाते में गई। इन दोनों परिणामों को देखकर सहज ही मुंह से निकला— ‘जब सत्ता को नशा चढ़ता है, जनता उतार देती है।’
इतिहास: इंदिरा, RSS, अटल-आडवाणी
इस चक्र को समझने के लिए हमें 50 साल पीछे जाना होगा।
1975 – आपातकाल: देश में आपातकाल लगा। लोकतंत्र निलंबित। इंदिरा गांधी सरकार ने जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई के साथ अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और राजमाता विजयाराजे सिंधिया को भी जेल में डाल दिया। जनसंघ उस समय सड़कों पर था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और तानाशाही के खिलाफ आवाज उठ रही थी। विपक्ष और सत्ता के बीच सीधी टक्कर थी।
1980 की वापसी: लेकिन राजनीति का पहिया तेजी से घूमता है। 1977 में इंदिरा गांधी बुरी तरह हारीं। जनता पार्टी की सरकार बनी। पर सवा दो साल में ही वो सरकार टूट गई। 1980 में इंदिरा गांधी 353 सीटों के साथ सत्ता में लौटीं।
यहीं से एक दिलचस्प अध्याय शुरू होता है। कई राजनीतिक लेखकों और इंदिरा जी के करीबी अनिल बाली के हवाले से कहा गया कि 1980 में RSS ने इंदिरा गांधी की वापसी में मौन समर्थन दिया। वजह साफ थी। 1977 के बाद मुसलमानों में कांग्रेस के प्रति नाराजगी थी। इंदिरा जी ने अपनी राजनीति का “हिंदूकरण” करने का फैसला किया। मंदिर जाना, धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल, ये सब उसी का हिस्सा था।
RSS प्रमुख बालासाहेब देवरस ने उस समय एक चर्चा में कहा था— ‘इंदिरा गांधी बहुत बड़ी हिंदू हैं।’ RSS और इंदिरा जी दोनों जानते थे कि उन्हें एक-दूसरे की जरूरत है। इंदिरा जी को हिंदू वोट बैंक और RSS को राजनीतिक मान्यता। इसलिए 1975 में जो “तानाशाह” थी, 1980 में उसी से सहयोग की गुंजाइश निकली। राजनीति में सिद्धांत से ज्यादा संभावना चलती है।
अटल-आडवाणी की भूमिका: 1980 में जनता पार्टी टूटी। अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में कहा था— ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।’ उसी दिन भारतीय जनता पार्टी बनी।
अटल जी का काम था भाजपा को राष्ट्रीय स्वीकार्यता दिलाना। वो गठबंधन की राजनीति के पक्षधर थे। धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ सरकार बनाना चाहते थे। वहीं आडवाणी जी का काम था संगठन खड़ा करना। उन्होंने कार्यकर्ता को केंद्र में रखा। बूथ स्तर तक RSS की मेहनत को चुनावी मशीन में बदला।
1984 में राजीव गांधी की लहर में भाजपा को सिर्फ 2 सीटें मिलीं। पर हार ने दोनों नेताओं को तोड़ा नहीं। अटल जी ने कहा— ‘हार से घबराना नहीं है।’ आडवाणी जी ने रथ यात्रा की। RSS ने घर-घर संपर्क किया। इसी त्रिवेणी से 1989 के बाद भाजपा केंद्र की सत्ता तक पहुंची। मतलब साफ है— हार भी अगर सही दिशा दे तो वो जीत की पहली सीढ़ी बन जाती है।
आज का आईना: बांकीपुर-दतिया 2026
इतिहास इसलिए जरूरी है ताकि वर्तमान समझ आए।
बांकीपुर: बिहार की ये सीट नितिन नबीन और उनके पिताजी की विरासत थी। 30 साल से भाजपा जीत रही थी। पर इस बार जन सुराज के प्रशांत किशोर ने 49% वोट और 19 हजार की बढ़त से जीत ली।
इसके पीछे 5 कारण थे। पहला, घोषित उम्मीदवार को बदलना। दूसरा, नीतीश कुमार के बिना चुनाव लड़ना जिससे JDU का वोटर कटा। तीसरा, भाजपा अध्यक्ष का “वायरस-कॉकरोच” वाला बयान। चौथा, कांग्रेस का RJD से हटकर PK को समर्थन। पांचवां, जमीन से संवाद की कमी।
PK ने एक लाइन से खेल पलट दिया— ‘आपने नीतीश को वोट दिया था, सम्राट को नहीं।’ रणनीतिकार से सीधे नेता बन गए।
दतिया: मध्य प्रदेश में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 6 हजार से ज्यादा वोटों से भाजपा की सीट छीन ली। यहां कोई बड़ा घोटाला नहीं था। मुद्दा था स्थानीय उपेक्षा। कार्यकर्ता नाराज थे। उन्हें लगा “जीत पक्की है” इसलिए सुनवाई नहीं होगी। नतीजा सामने है।
पक्ष-विपक्ष के लिए 4 सबक
- RSS का सबक: 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बयान आया था कि “अब भाजपा को RSS की जरूरत नहीं है।” नतीजा सबने देखा। सीटें 303 से 240 पर आ गईं। संगठन से दूरी का मतलब बूथ से दूरी होता है। अटल-आडवाणी के जमाने में यही सीख थी कि चुनाव RSS के कार्यकर्ता ही जिताते हैं।
- अटल जी का सबक: हार के बाद भी मर्यादा। गठबंधन धर्म। अटल जी ने सिखाया कि सत्ता के लिए समझौता करो, पर सिद्धांत से समझौता मत करो। आज जब तीसरे विकल्प उभर रहे हैं, तब ये सबक और जरूरी है।
- आडवाणी जी का सबक: एक सामान्य कार्यकर्ता को भी नेता बनाया जा सकता है। संगठन ही पार्टी की रीढ़ है। बांकीपुर में भाजपा हारी क्योंकि संगठन और जनता के बीच की कड़ी कमजोर हुई।
- इंदिरा जी का सबक: 1977 में सत्ता गई तो आत्ममंथन किया। 1980 में रणनीति बदली और वापसी की। हार को स्वीकार कर उससे सीखना, यही राजनीति का धर्म है।
निष्कर्ष…..✍️
आज तस्वीर बदल रही है। भाजपा सत्ता में है, कांग्रेस मुख्य विपक्ष में, और प्रशांत किशोर जैसा तीसरा विकल्प बिहार में जगह बना रहा है। पर इतिहास हमें चेताता है कि ‘तानाशाह इंदिरा’ बनाम ‘लोकतंत्र सेनानी RSS’ की कहानी बहुत सीधी नहीं है। 1975 में विरोध और 1980 में सहयोग। ये दोनों सच हैं।
3 अगस्त के उपचुनाव ने फिर वही पुराना नियम याद दिलाया। गढ़ तब गिरते हैं जब नेता जमीन से कट जाते हैं। जब जीत के अहंकार में जनता की छोटी-छोटी जरूरतें अनसुनी होने लगती हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है। ये समय-समय पर सत्ता को आईना दिखाता रहता है। और उस आईने का नाम है