राजगढ़ ब्यूरो चीफ संतोष गोस्वामी
”नियम ताक पर… और सांसें हलक में!”
ज़रा गौर से देखिए इन तस्वीरों को! यह कोई फिल्म का स्टंट नहीं, बल्कि पचोर के समीप बहते उफान मारते नाले की ज़मीनी हकीकत है।सामने दिख रहा है उफनता हुआ नाला, सड़क पर बहती तेज़ धार… लेकिन ड्राइवर ने क्या सोचा? “बस तो निकल ही जाएगी!” >
नतीजा? नाले के बीचों-बीच बस बंद हो गई! गनीमत रही कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ और स्थानीय लोगों की मदद से सभी सवारियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। लेकिन ज़रा सोचिए—अगर पानी का बहाव थोड़ा और तेज़ होता या बस पलट जाती, तो इसका जिम्मेदार कौन होता? हर साल मानसून में प्रशासन मुनादी करवाता है—”उफनते पुल और नालों को पार न करें!” >
फिर भी चंद मिनटों की जल्दी और चंद रुपयों के लालच में यात्रियों की जान जोखिम में क्यों डाली जाती है?
क्या ड्राइवर को बहते पानी की ताकत का अंदाजा नहीं था?
या फिर लोगों की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी सफर पूरा करना था आज किस्मत अच्छी थी कि सभी सुरक्षित बच गए। लेकिन हर बार किस्मत साथ नहीं देती!
याद रखिए: पानी का बहाव गाड़ी के टायरों को सेकंडों में उखाड़ सकता है। ऐसी लापरवाही सिर्फ ड्राइवर की नहीं, बल्कि उस बस में बैठकर चुपचाप खतरा मोल लेने वाले हर मुसाफिर की भी है।