भाव हिंसा से बचें, क्योंकि इससे जीवों का होता है बहुत घात : मुनिश्री सुप्रभसागर
भावो की निर्मलता, वाणी पर संयम और धर्माराधना से जीवन में आती है शांति
(देवली से मुकेश कुमार जैन।) धर्मोपदेश देते हुए मुनिश्री सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि अशुभ प्रवृत्तियां ही हिंसा का कारण बनती हैं। जैन दर्शन में भाव हिंसा को अधिक पाप का कारण माना गया है। भाव हिंसा से बचने के लिए अपने परिणामों को समता एवं संयम से सहित रखना चाहिए। काय से व्यर्थ के कार्य नहीं करने चाहिए तथा वचन से भी अनर्थकारी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। हिंसा से बचने के लिए ऐसा व्यापार भी नहीं करना चाहिए, जिससे जीवों को बहुत घात होता हो।
मुनिश्री ने कहा कि भगवान के पास भक्त बनकर आओ, भिखारी बनकर नहीं। भगवान की आराधना करने वाले व्यक्ति को बिना मांगे चक्रवर्ती, विद्याधर और इंद्र पद की प्राप्ति अपने आप हो सकती है तथा परंपरा से मोक्ष भी प्राप्त कर लेते हैं। भगवान के पास जाने से जन्म-जरा-मृत्यु के रोग नष्ट हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि शरीर के रोगों का शमन करने के लिए लोग चिकित्सालय जाते हैं, उसी प्रकार आत्मा के रोगों को दूर करने के लिए जिनालय में जाना चाहिए। भगवान की आराधना करने वाला व्यक्ति इंद्रिय विषयों के आकर्षण से दूर होकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
मुनिश्री ने धर्मसभा में कहा कि धर्म के प्रभाव से पुण्य का संचय होता है। धर्म की आराधना, जिनवाणी का श्रवण, पूजा-पाठ, प्रक्षालन एवं शास्त्रदान जैसे धार्मिक कार्यों से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में धर्म, संयम और सदाचार को अपनाकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।














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